बुधवार, फ़रवरी 13

ओढ़ते तरुवर नूतन गात



ओढ़ते तरुवर नूतन गात


उड़ा मकरंद, बहा आनंद
गाया प्रकृति ने नव छंद

पड़ी ढोलक पर प्यारी थाप
हर कहीं रंगों वाली छाप

मधुर सी बहने लगी बयार
मदिर मौसम ने घोला प्यार

छूट जाते यूँ पीले पात
ओढ़ते तरुवर नूतन गात

विटप हँस दिए गाल कर लाल
खिली सरसों कर पीले हाथ

नासिका पुट महकाए बौर
गमक छाई ज्यों चारों ओर

पुलक भर फूला ढाक, पलाश
थमी तितली की मृदु तलाश

दूर से आती है अनुगूँज
बजी पायल, न फागुन दूर

बसंती बाना ऋतु मदमस्त
चढ़ा मधुमास सभी अलमस्त

देवी वागीशा वन्दित
धूप, मंत्रो से हुईं अर्चित

दिगों तक उड़ा मधुर उच्छ्वास
झूमती मीठी मधुर सुवास

सुहाने दिन चन्दन सी धूप
फिजां पर कैसा रूप अनूप

लगी हल्दी सरसों के अंग
सिंदूरी भाल पलाश के संग

फैली गली-गली यह बात
सजी भू, आया है ऋतुराज
  

14 टिप्‍पणियां:

  1. बसंत ऋतु के आगमन सी ताजातरीन रचना.... बहुत सुन्दर!

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    1. संजय जी, स्वागत है आपका..शुक्रिया !

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    1. शालिनी जी, बहुत-बहुत आभार !

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    1. संगीता जी, वसंत का जादू ऐसा ही है..

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  4. ऋतुराज वसंत का स्वागत करती सुन्दर पोस्ट।

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  5. इस मदिर-मदिर मौसम का आलम ही ऐसा है .

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  6. मदनोत्सव की पूर्व संध्या वेला में उत्कृष्ट कोटि का प्रेम गीत .प्रकृति नटी भी गाती है प्रेम गीत .

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    1. वीरू भाई, प्रकृति सचमुच प्रेम मयी है..आभार!

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