गुरुवार, फ़रवरी 21

यह दिन भला-भला लगता है


यह कविता मैंने अपनी उस सखी के लिए लिखी है, जो उम्र के चौथे दशक के आखिरी पड़ाव में कार चलाना सीख रही है, आज उसके विवाह की छब्बीसवीं सालगिरह है.
यह दिन भला-भला लगता है 

नहीं भरोसा रहा तुम्हारा
चुपके-चुपके क्या कर डालो,
कार चलाना सीख रही हो
घर संग, स्टीयरिंग भी सम्भालो !

शॉपिंग करती, पहनो मैचिंग
दूर-दूर तक जाओ घूमने,
पूरी करो हसरतें दिल की
नहीं अधूरे रहें ये सपने !

तुम भी तो मन के मालिक हो
टीवी के ऐसे दीवाने, 
रहे कैमरा हाथों में या
वाह, वाह ! के सुनो फसाने !

सेहत देख आपकी अब तो
किचन में सारे व्यंजन बनते,
जो तुमको रुचता हो अक्सर
सालन भाजी वही तो बनते !

प्रिय पुत्री है गर्व हमारा
दोनों की आदतें हैं जिसमें,
वही साक्षी हम दोनों की
प्रेम हमारा झलके उसमें !

सेवा कर माँ को खुश रखें
यही प्रयास चला करता है,
जीवन के क्रम चलते रहते
यह दिन भला-भला लगता है !

14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत प्यारी रचना ...आपकी सहेली को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें

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  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  3. बहुत प्यारा गीत लिखा ...
    आपकी सहेली को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ !!

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  4. बहुत प्यारी रचना ...आपकी सहेली को बहुत बधाई

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  5. आपकी सखी बड़ी भाग्यशाली हैं जो आपने उन पर ये कविता रची...
    शुभकामनाएं आप दोनों को.

    सादर
    अनु

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  6. बहुत ही प्यारी व सुन्दर भावाभियक्ति
    सादर !

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  7. वाह! अनीता जी , आपकी सूक्ष्म दृष्टि कितना कुछ समेट लेती है.. चकित करती हुई..

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  8. bahut bahut acchi lagi apki rachna.....mujhe prerna bhi mili ki main bhi sikh sakti hu ....sikhne ki koi umar nahi hoti

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  9. aatmvishwas k aage umr koi ahmiyat nahi rakhti.......confidence hain to vo jaldi hi seekh jayengi car chalana.....

    sunder abhivyakti.

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  10. बहुत उम्दा पंक्तियाँ ..... वहा बहुत खूब
    मेरी नई रचना
    खुशबू
    प्रेमविरह

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  11. संगीता जी, दिनेश जी, अनामिका जी, इमरान, मनोज जी, रेवा जी, अमृता जी, शिवनाथ जी, अनु जी, कालीपद जी, वन्दना जी, ऋता जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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