रविवार, दिसंबर 11

नींद उड़ी रातों की उनकी


नींद उड़ी रातों की उनकी 

काले धन को गोरा कर लें 
इसी जुगत में हैं कुछ लोग,
नींद उड़ी रातों की उनकी 
भरे तिजोरी में जो नोट !

नोटों के बंडल के बंडल 
कर चोरों के दिल में हलचल,
दूजों के खातों  में डालें 
तरह-तरह के करते छल बल !

सोना, चाँदी तोल रहे हैं 
कहीं जमीनों के भी चक्कर,
किसी तरह भी टैक्स बचा लें 
बने हुए कैसे घनचक्कर !

जाने किस मिट्टी के बने हैं 
चैन से ऊपर धन को रखते,
इज्जत चाहे लगी दांव पर 
काले धन से बाज न आते !

आँखें फ़टी हुई रह जातीं 
अख़बारों मे वही छप रहे,
बात करोड़ों और किलों की
 बिरला, टाटा रोज बन रहे !

किन्तु न अब यह और चलेगा 
कानून अब नहीं बिकेगा,
कालाबाजारी न होगी
देश नहीं यह जुर्म सहेगा !





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