मंगलवार, दिसंबर 13

राग प्रीत का जो साधा था

राग प्रीत का जो साधा था  

है विशाल, अनन्त, अनूठा 
कैसे लघु मन उसको जाने 
शिखर चाहता भय खाई से 
सीमा स्वयं की, यह न माने !

खुल जायेगा हर वह बंधन 
सुख की आस में जो बाँधा  था,
छलक-छलक वह बह जाएगा 
राग प्रीत का जो साधा था !

युगों-युगों से गूँज रहा स्वर 
अंतरिक्ष न बाँच  सका  है,
गा - गा कर खग वृन्द थके न 
क्यों उर में संदेह  जगा है !

अश्रु बने हैं पाती जिसके 
कतरा- कतरा बहे सभी दुःख,
एक अलस मद मस्त खुमारी 
बून्द-बून्द कर रिसता है सुख !

सदा निहारे नयन मौन हो 
श्वासों में गंध बन बसता,
साया कोई संग चल रहा 
 परस पवन का  दे-दे  हँसता !






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