गुरुवार, दिसंबर 8

जीवन जैसे एक पहेली




जीवन जैसे एक पहेली 


सुख के पीछे रहे भागते 
मुट्ठी खोली दुःख ही था,
स्वप्न स्वर्ग के रहे पालते 
कदमों तले नर्क ही था !

जीवन जैसे एक पहेली 
उलझ गया कोई हो जाल,
हल न जिसका मिला किसी को  
ऐसा मुश्किल एक सवाल !

नजरें जब तक लगीं गगन पर
घर का दीप अदेखा रहता,
सपनों के पीछे जो भागा
मन पँछी वह कैद हुआ !

कर्म सफल हो चाहा इतना
किंतु सफलता रही अधूरी,
आशा का बिरवा बोया था
किसकी आस हुई है पूरी !














कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें