मंगलवार, दिसंबर 20

स्वप्नों सी वे झर जाती हैं

स्वप्नों सी वे झर जाती  हैं 

खुशियों को पा लेने का भ्रम 
नहीं मिटाता जीवन से गम, 
स्वप्नों सी वे झर जाती  हैं 
या जैसे फूलों से शबनम !

एक दौड़ में शामिल है जो 
श्रम ही जिसने जाना जीवन,
क्लान्त कभी तो डरता होगा 
थक कर  सो जाता जो मन !

बाहर शिखरों पर पहुँचा है 
नहीं ठिकाना भीतर पाया,
बंधा रहा सीमाओं में ही  
आजादी का जश्न मनाया !











5 टिप्‍पणियां:

  1. यही तो आज के जीवन की विडम्बना है...बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 22-12-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2564 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  3. वाह क्या बात ... सीमाओं में रह कर आज़ादी का जश्न ... मिथ्या ही है ...

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