शुक्रवार, दिसंबर 16

दृष्टि धूमिल मोहित है मन

दृष्टि धूमिल मोहित है मन 

 किसी-किसी दिन झूठ बोलता लगता दर्पण
नयन दिखाते वही देखना चाहे जो भी मन !

दृष्टि धूमिल मोहित है मन 
धुंधला-धुंधला सा संसार,
प्रिय को महिमामंडित करता 
छलक रहा जब अंतर प्यार !

सत्य छिपा ही रहता इक तरफ़ा जब अर्पण 
श्रवण सुनाते वही सुनना चाहे जो भी मन !

पक्षविहीन खड़ा  हो जग में 
शक्तिहीन के लिए असम्भव,
झुक जाता है निज पक्ष में 
झेल आत्मा का पराभव !

थोड़े में सन्तुष्ट हुआ जो काट सके न बंधन 
बुद्धि सुझाती वही जानना चाहे जो भी मन !


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