बुधवार, फ़रवरी 14

इश्क की दास्ताँ





इश्क की दास्ताँ


उसने दिए थे हीरे हम कौड़ियाँ समझ के
जब नींद से जगाया रहे करवटें बदलते

ओढ़ा हुआ था तम का इक आवरण घना सा
माना  स्वयं  को घट इक जो ज्ञान से बना था

गीतों में प्रेम खोजा झाँका न दिल के भीतर
दरिया कई बसे थे बहता था इक समुन्दर

गहराइयों में दिल की इक रोशनी सदा है
उतरा नहीं जो डर से उस शख्स से जुदा है 

तनहा नहीं किसी को रखता जहाँ का मालिक
हर दिल में जाके पहले वह आप ही बसा है

जिस इश्क के तराने गाते हैं लोग मुस्का
मरके ही मिलता सांचा उस इश्क का पता 

उस एक का हुआ जो हर दिल का हाल जाने
सबको लगन है किसकी यह राज वही जाने

14 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' १९ फरवरी २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

    विशेष : आज 'सोमवार' १९ फरवरी २०१८ को 'लोकतंत्र' संवाद मंच ऐसे एक व्यक्तित्व से आपका परिचय करवाने जा रहा है। जो एक साहित्यिक पत्रिका 'साहित्य सुधा' के संपादक व स्वयं भी एक सशक्त लेखक के रूप में कई कीर्तिमान स्थापित कर चुके हैं। वर्तमान में अपनी पत्रिका 'साहित्य सुधा' के माध्यम से नवोदित लेखकों को एक उचित मंच प्रदान करने हेतु प्रतिबद्ध हैं। अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य"

    उत्तर देंहटाएं
  2. तनहा नहीं किसी को रखता जहाँ का मालिक
    हर दिल में जाके पहले वह आप ही बसा है----- वाह! बहुत खूब!!!!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. स्वागत व आभार विश्वमोहन जी !

      हटाएं
  3. बहुत बहुत आभार ध्रुव जी !

    उत्तर देंहटाएं
  4. लाजवाब !! बहुत खूब आदरणीया ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. हर दिल में वही बसा है पर उस प्रेम को हर कोई देख नहीं पाता ... भावपूर्ण ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. गहराइयों में दिल की इक रोशनी सदा है
    उतरा नहीं जो डर से उस शख्स से जुदा है
    प्रेम को हर कोई देख नहीं पाता ... भावपूर्ण

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. सही कहा है आपने संजय जी..आभार !

      हटाएं