शुक्रवार, फ़रवरी 9

अनुरागी मन



अनुरागी मन

कैसे कहूँ उस डगर की बात
चलना छोड़ दिया जिस पर
अब याद नहीं
कितने कंटक थे और कब फूल खिले थे
 पंछी गीत गाते थे
या दानव भेस बदल आते थे
अब तो उड़ता है अनुरागी मन
भरोसे के पंखों पर
अब नहीं थकते पाँव
' न ही ढूँढनी पड़ती है छाँव
नहीं होती फिक्रें दुनिया की
 उससे नजर मिल गयी है
घर बैठे मिलता है हाल
सारी दूरी सिमट गयी है !

14 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' १२ फरवरी २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

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  2. आपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 14फरवरी 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. बहुत खूब ओका है अनुरागी मन को अनीता जी

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  4. ओका माने क्या अलकनंदा जी..कहीं आंका तो कहना नहीं चाह रही थीं आप..

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  5. उससे नज़र मिल जे अनुराग तो स्वतः जागेगा ...
    प्रेम मिल जाए तो बाक़ी क्या ...

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