सोमवार, अगस्त 24

धरती सदा लुटाती वैभव

 

धरती सदा लुटाती वैभव

 

धरती हर तन को धारे है 

वसुधा तप से प्राणी हैं थिर, 

पृथ्वी का आकर्षण बाँधे

भूमि में ही मिलेंगे इक दिन ! 

 

छिपे धरा में मोती-माणिक 

नदियाँ बहतीं हिम शिखरों से, 

रुधिर नाड़ियों में संचारित 

अनगिन राज छिपे नर तन में !

 

भू भ्रमण चले अपने धुर पर  

परिक्रमा रवि की भी करती, 

तन भी मुड़-मुड़ देखे खुद को 

प्रदक्षिणा सविता मेधा की !

 

धरा स्थूलतम टिकी सूक्ष्म पर 

देह भी मन के रहे आश्रित, 

मन में मृत यदि जीवन आशा 

कर देता है इसे विखण्डित !

 

धरा शुद्ध हो कुसुम खिलाये 

शुभ सुंदर लावण्य लुभाये, 

नयन हँसे रोम-रोम पुलकित 

गालों पर गुलाब खिल जाएँ ! 

 

महाभूत यह महादेव का 

धरती सदा लुटाती वैभव, 

कैसे यह उपकार चुकेगा 

सदा बिखेरे करुणा सौरभ !

 

 

14 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में मंगलवार 25 अगस्त 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (26-08-2020) को   "समास अर्थात् शब्द का छोटा रूप"   (चर्चा अंक-3805)   पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --  
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
    --

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  3. आदरणीया मैम ,
    बहुत ही सुंदर कविता. सच हम धरती माँ का उपकार कभी नहीं चूका सकते। प्रकृति माता सदा ही करुणामयी हो क्र हमारा पालन पोषण करती रहतीं हैं।
    अब से मेरा यहाँ आना होता रहेगा।
    सुंदर रचना के लिए ह्रदय से आभार व मेरी रचना "अहिल्या " पर आपके प्यारभरे आशीष के लिए भी ह्रदय से आभार व सादर नमन।

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  4. धरती की इस महत्ता को कौन नहीं समझ पायेगा ... जीवन-दाई, सब को सब कुछ देती ही है ... अंत में समेत भी लेती है अपने अंक में ...

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