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सोमवार, जनवरी 30

बेगानी है हरी दूब भी


बेगानी है हरी दूब भी

मरुथल बियाबान के वासी
फूलों से रहते अनजाने,
बूंद-बूंद को जो तरसे हैं
नदियों से रहते बेगाने !

स्वप्न सरीखे उनको लगते
उपवन, सरवर, झरने, पंछी,
जिसने मीलों रेत ही देखी
बेगानी है हरी दूब भी !

शब्दों में न सत्य समाता
मरुथल से सूने सपाट हैं,  
अंतर में बहार न छाती
जब तक न खुलते कपाट हैं !

सम्बन्धों में खुशी छिपी थी  
रहे कैद हम निज सीमा में,
एक ऊर्जा का प्रवाह था
रोक दिया है जिसको हमने !

जीवन इक अनंत पर्व है
संबंधों में राज छिपा है,
पहले खुद से, फिर उस रब से
फिर जग से संवाद हुआ है !