बेगानी है हरी दूब भी
मरुथल बियाबान के वासी
फूलों से रहते अनजाने,
बूंद-बूंद को जो तरसे हैं
नदियों से रहते बेगाने !
स्वप्न सरीखे उनको लगते
उपवन, सरवर, झरने, पंछी,
जिसने मीलों रेत ही देखी
बेगानी है हरी दूब भी !
शब्दों में न सत्य समाता
मरुथल से सूने सपाट हैं,
अंतर में बहार न छाती
जब तक न खुलते कपाट हैं !
सम्बन्धों में खुशी छिपी थी
रहे कैद हम निज सीमा में,
एक ऊर्जा का प्रवाह था
रोक दिया है जिसको हमने !
जीवन इक अनंत पर्व है
संबंधों में राज छिपा है,
पहले खुद से, फिर उस रब से
फिर जग से संवाद हुआ है !