सोमवार, जनवरी 30

बेगानी है हरी दूब भी


बेगानी है हरी दूब भी

मरुथल बियाबान के वासी
फूलों से रहते अनजाने,
बूंद-बूंद को जो तरसे हैं
नदियों से रहते बेगाने !

स्वप्न सरीखे उनको लगते
उपवन, सरवर, झरने, पंछी,
जिसने मीलों रेत ही देखी
बेगानी है हरी दूब भी !

शब्दों में न सत्य समाता
मरुथल से सूने सपाट हैं,  
अंतर में बहार न छाती
जब तक न खुलते कपाट हैं !

सम्बन्धों में खुशी छिपी थी  
रहे कैद हम निज सीमा में,
एक ऊर्जा का प्रवाह था
रोक दिया है जिसको हमने !

जीवन इक अनंत पर्व है
संबंधों में राज छिपा है,
पहले खुद से, फिर उस रब से
फिर जग से संवाद हुआ है !   

5 टिप्‍पणियां:

  1. अपने अन्दर के हरी दूब से हम ही कितने बेगाने होते हैं..और शब्दों की खुशियाँ जीने में लगे रहते हैं.. कितनी गहराई लिए आपकी रचना होती हैं..

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  2. जीवन इक अनंत पर्व है
    संबंधों में राज छिपा है,
    पहले खुद से, फिर उस रब से
    फिर जग से संवाद हुआ है !

    सबसे पहले खुद से होना ही लाज़मी है......सुन्दर पोस्ट|

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  3. जीवन इक अनंत पर्व है
    संबंधों में राज छिपा है,
    पहले खुद से, फिर उस रब से
    फिर जग से संवाद हुआ है !

    पूरा जीवन इंसान संबंधों में इसी संवाद को खोजते रहता है,
    किन्तु एक बार अपने पर दृष्टि डालते ही
    सारे संवाद समाप्त हो जाते हैं...

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  4. सम्बन्धों में खुशी छिपी थी
    रहे कैद हम निज सीमा में,
    एक ऊर्जा का प्रवाह था
    रोक दिया है जिसको हमने !

    संबंधों का अनादर कुंठा को उत्पन्न करता. संवाद स्थापित करना नितांत आवश्यक है. सुंदर प्रस्तुति के लिये बधाई.

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