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बुधवार, फ़रवरी 16

सब कुछ सौंप दिया है तुझको


हम ईश्वर से कहते हैं कि अपना सब कुछ तुझे सौंपते हैं पर ईश्वर, वह क्या कहता है, क्या उसने सब कुछ मानव को नहीं दे दिया है।


सब कुछ सौंप दिया है तुझको


तेरी ख़ातिर ही तो मैं हूँ

व्यर्थ ही तू फ़िक्र में डूबा, 

उर अंतर श्रद्धा  से भर ले 

अप्राप्य रहेगा कुछ भी ना


संग सदा सहज डोलेंगे

उलझन में तू क्यों भ्रमता है,

मन जो गोकुल बन सकता था

क्यों उदास सा नभ तकता है !


तू है मेरा प्रियतम अर्जुन !

वंचित क्यों है परम प्रेम से,

क्या जग में जो पा न सके तू 

जग चलता है अमर प्रेम से !


सब कुछ सौंप दिया है तुझको

अगन, पवन, जल और धरा में,

किस आकर्षण ने बाँधा है 

डोले सुख-दुःख, मरण-जरा में !


करुणा सदा बरसती सब पर

बस तू मन को पात्र बना ले,

जीवन बन जायेगा मंदिर

दिवस-रात्रि का गान बना ले ! 


रविवार, अगस्त 29

अद्भुत बड़ी कृष्ण की लीला


अद्भुत बड़ी कृष्ण की लीला

मथुरा रोयी होगी उस दिन 

कान्हा चले जब यमुना पार,

जिस धरती पर हुए अवतरित

 दे नहीं पायी उन्हें दुलार !


अभी तपस्या की बेला है 

बारह वर्षों की प्रतीक्षा,

लौट करेंगे कृष्ण किशोर

कंस के कृत्य की समीक्षा !


अभी तो गोकुल जाते कान्ह 

नन्द, यशोदा को हर्षाने,

ग्वालों, गैयों, साथ खेलने

संग गोपियों रास रचाने !


माखन चोरी, मटकी फोड़ी

असुर-वध किये  नित नव लीला,

मनहर नृत्य, बाँसुरी वादन

ब्रज वासी कान्हा रंगीला !


पलक झपकते बीता बचपन

 मथुरा जाने का दिन आया,

तड़पा हर ब्रज वासी का उर

नन्द यशोदा को तड़पाया !


राधा की आँखें बरसीं थीं 

विरहा की पीड़ा थी भारी,

अद्भुत बड़ी कृष्ण की लीला,

 अब तक सारी दुनिया वारी !




बुधवार, अगस्त 12

गोकुल बना महकता उर यह

 गोकुल बना महकता उर यह 

 

टूट गए जब ताले मन के 

खुलीं बेड़ियाँ मोह, अहम की, 

गोकुल बना महकता उर यह 

प्रकट भये श्यामा सुंदर भी !

 

वह चितचोर नन्द का लाला 

आनँदघन हरि मुरलीवाला, 

निर्मल मन नवनीत बना जब  

उस घट आकर डाका डाला !

 

प्रेम-विरह दोनों का रसिया 

अविचल भक्ति सुरस बरसाये, 

नित नई चुनौती स्वीकारे 

रास रचाने झट आ जाये !

 

अव्यक्त ब्रह्म पूर्ण व्यक्त हो 

वृन्दावन के श्याम सरीखा, 

चंचल, धीर, योगी व ज्ञानी  

मीत कन्हैया सखा अनोखा !


गुरुवार, अगस्त 9

मानो हुआ प्रेम साकार


कृष्ण जन्माष्टमी पर हार्दिक शुभकामनायें...

मानो हुआ प्रेम साकार

अति सुहाना समय हुआ था
शांत-सौम्य, सारा ब्रह्मांड,
चमक रहे थे झिलमिल तारे
दिशा स्वच्छ, निर्मल आकाश !

नदियों का जल निर्मल, शीतल
खिले हुए अनगिनत कमल,
शीतल, मंद, सुगन्धित वायु
रह-रह कर छूती यमुना जल !

गूंज उठा बालक के स्वर से
मथुरा का वह कारागार,  
सुंदर, श्यामल देह अनूठी
मानो प्रेम हुआ साकार !

कम्पित हुआ कंस भी होगा
पुत्र आठवाँ काल था उसका,
किये मूर्छित रक्षक सारे
ले आश्रय योगमाया का !

घिर आयी तब घटा अचानक
जल से भरे हुए बादल थे,
गहन अंधकार छाया था
बरसे झूम एक जलथल थे !

वसुदेव गोकुल जा पहुँचे
पार किया यमुना का पाट,
सोयी कन्या बदले में ली
कान्हा भया नन्द का लाल !

रस स्वरूप वह कृष्ण कन्हाई
प्रेम भरे अंतर में रहता,
सुख की सदा फुहार बरसती
नयनों से अश्रु जल बहता !

मधुर वेदना बन आता है
नेह, राग, अनुराग भी कह लें,
प्रेम के जितने रूप जानते
उस कान्हा को देकर बह लें !

ज्यों तरंग पूछे सागर से
कहाँ है जल? ‘मैं ही तो हूँ’
कोई पूछता है कान्हा से
कहाँ हो तुम ? बस मैं ही तो हूँ

पिघल गया हो नेह ताप से
वह अंतर जो निर्मल, कोमल,
सहज ही बहता कृष्ण ओर वह
ज्यों नदिया खोजे सागर जल !

एक ही बाधा है मिलने में
बीच खड़ी ‘मैं’ की दीवार,
कुम्भ के भीतर-बाहर जल है
टूटे से होता इक सार !  
  
  





गुरुवार, अक्टूबर 27

समुन्दर...नाव...बदली..


समुन्दर...नाव...बदली...

पूछोगे नहीं
क्यों मौन रुचा
क्यों न फूटे बोल, न तुमसे बोली
नहीं चाहती बनना नाव, न ही बदली
मेरा वही समुन्दर दे दो
मै लहराती, गाती नदिया
मैं चलती-चलती ही जाती
तुम बने समुन्दर,  मुझको लेकर
मैं एक भावना, पूर्ण याचना
स्वप्नों के पंख लगाये
गाती भावलोक में सुंदर
तुम कहते फिर
स्वप्न असत्य
आँखें आँसू, आँसू आँखें
फिर कैसे मैं तुमसे बोलूं
तोड़ा तुमने घर माटी का
बादल बन भिगो दिया मन
 गात भी मेरा
फिर क्यों ऐसी नींद सुलाया
बहा ले गए गाँव सारा एक रात्रि में
उसी गाँव को.....उस गोकुल को...
स्वप्न बसा जिसका आँखों में...


 

बुधवार, अक्टूबर 27

कहाँ खो गयी

कहाँ खो गयी

कहाँ खो गयी

लुप्त हो गयी

प्रेम बाँसुरी की धुन प्यारी !


चैन ले गया

वैन दे गया

गोकुल का छलिया गिरधारी !


देने में सुख

चाह ही दुःख

सीख दे रही हर फुलवारी !


मौन हुआ मन

अविचल स्थिर तन

बरसी भीतर रस पिचकारी !


अगन विरह की

तपन हृदय की

जल जाये हर भूल हमारी !


अनिता निहालानी
२७ अक्तूबर २०१०  

बुधवार, सितंबर 1

कृष्ण जन्माष्टमी

कृष्ण जन्माष्टमी 

मथुरा रोयी होगी उस दिन, कृष्ण चले जब यमुना पार 
जिस भूमि पर हुए अवतरित, न दे पायी उन्हें दुलार I 

अभी तपस्या की बेला है, बारह वर्षों की प्रतीक्षा 
लौट करेंगे कृष्ण किशोर, कंस कृत्य की समीक्षा I 

अभी तो गोकुल जाते कान्हा, नन्द यशोदा को हर्षाने 
ग्वालों, गैयों, संग खेलने, संग गोपियों रास रचाने I 

माखन चोरी, मटकी तोड़ी, असुर-वध नित नयी लीला 
मधुर वचन, बांसुरी वादन, ब्रज वासी कृष्ण रंगीला I 

पलक झपकते बीता बचपन, मथुरा जाने का दिन आया 
तड़पा हर ब्रज वासी का उर, नन्द यशोदा उर घबराया I 

राधा की आँखें बरसीं विरह की पीड़ा थी भारी 
अद्भुत थी कृष्ण की लीला, अब तक सृष्टि है वारी I 

अनिता निहालानी 
१ सितम्बर २०१०