हम ईश्वर से कहते हैं कि अपना सब कुछ तुझे सौंपते हैं पर ईश्वर, वह क्या कहता है, क्या उसने सब कुछ मानव को नहीं दे दिया है।
सब कुछ सौंप दिया है तुझको
तेरी ख़ातिर ही तो मैं हूँ
व्यर्थ ही तू फ़िक्र में डूबा,
उर अंतर श्रद्धा से भर ले
अप्राप्य रहेगा कुछ भी ना
संग सदा सहज डोलेंगे
उलझन में तू क्यों भ्रमता है,
मन जो गोकुल बन सकता था
क्यों उदास सा नभ तकता है !
तू है मेरा प्रियतम अर्जुन !
वंचित क्यों है परम प्रेम से,
क्या जग में जो पा न सके तू
जग चलता है अमर प्रेम से !
सब कुछ सौंप दिया है तुझको
अगन, पवन, जल और धरा में,
किस आकर्षण ने बाँधा है
डोले सुख-दुःख, मरण-जरा में !
करुणा सदा बरसती सब पर
बस तू मन को पात्र बना ले,
जीवन बन जायेगा मंदिर
दिवस-रात्रि का गान बना ले !



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