गुरुवार, अक्तूबर 27

समुन्दर...नाव...बदली..


समुन्दर...नाव...बदली...

पूछोगे नहीं
क्यों मौन रुचा
क्यों न फूटे बोल, न तुमसे बोली
नहीं चाहती बनना नाव, न ही बदली
मेरा वही समुन्दर दे दो
मै लहराती, गाती नदिया
मैं चलती-चलती ही जाती
तुम बने समुन्दर,  मुझको लेकर
मैं एक भावना, पूर्ण याचना
स्वप्नों के पंख लगाये
गाती भावलोक में सुंदर
तुम कहते फिर
स्वप्न असत्य
आँखें आँसू, आँसू आँखें
फिर कैसे मैं तुमसे बोलूं
तोड़ा तुमने घर माटी का
बादल बन भिगो दिया मन
 गात भी मेरा
फिर क्यों ऐसी नींद सुलाया
बहा ले गए गाँव सारा एक रात्रि में
उसी गाँव को.....उस गोकुल को...
स्वप्न बसा जिसका आँखों में...


 

5 टिप्‍पणियां:

  1. अभिव्यक्ति का यह अंदाज निराला है. आनंद आया पढ़कर.

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  2. उसी गाँव को.....उस गोकुल को...
    स्वप्न बसा जिसका आँखों में..……………बेहद गहरे भावो का समावेश्।

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