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शनिवार, अप्रैल 25

नई मंजिलें राह देखतीं

नई मंजिलें राह देखतीं

 

जाने कहाँ-कहाँ से आते 

मन दिन-रात गुना करता है,

कई विचारों के गालीचे

यह दिन-रात बुना करता है !

 

सोये-सोये जन्मों बीते ,

 अब तो जगे भाग्य जो खोया, 

वही मिलेगा इस जीवन में 

जो कुछ कल हमने था बोया!

 

रंग भरें सुकल्पनाओं में, 

जीवन का पथ सुंदर होगा

नित्य नया निखार आयेगा, 

पहले से सुंदर कल होगा !

 

ऋतु आने पर बीज पनपते 

भीतर कोई चेता देता,

शुभ संकल्प बीज के सम ही 

सही समय पर ही फल देता!

 

नई मंजिलें राह देखतीं, 

रस्ते कुछ नव बुला रहे हैं

कर्म सदा हों सबके हित में, 

गीत यही तो सुना रहे हैं!


शुक्रवार, सितंबर 20

कविता

कविता 

सुना आपने

अब कविता पढ़ना मुझे नहीं भाता 

अक्सर मैं कविता का पेज ही खोल कर नहीं देखती 

टिकने ही नहीं देती आँखों को शीर्षक पर

 एक क्षण के लिए भी 

शायद भय है अंतर्मन में 

पुराना प्रेम जाग न उठे 

न लगने लगें कविताएँ अपनी-अपनी 

सो दूर से ही नमन करती हूँ 

नहीं तौलती शब्दों को 

भावों को अनुभूति में नहीं लाती

विचारती हूँ, परखती हूँ 

पर नहीं देखती, न छूती  

वृक्षों, पत्तियों और फूलों को 

मैं बिगड़ गई हूँ 

एक कली ने कल राह चलते कहा था 

मैंने अनसुना कर दिया 

कान नहीं दिये 

क्योंकि अब मैं वह नहीं रही 

मुझे अभाव नहीं है कोई 

 सभी कुछ है 

अब फूलों को अपना दुख सुनाने को रहा ही नहीं 

हवा का संगीत सुनने का वक्त नहीं 

फिर क्यों कविता पढ़ूँ 

क्यों अफ़सोस करूँ 

भ्रष्टाचार पर, असमानता पर, बेरोज़गारी पर 

क्यों नाराज़ रहूँ भ्रष्ट सत्ता से 

अब मैं स्वतंत्र हूँ 

अपने पैरों पर हूँ 

अब सब ठीक चल रहा है 

पेड़ कहीं कटते होंगे 

मुझे आवाज़ सुनायी नहीं देती 

नारे लगते होंगे, जुलूस निकलते होंगे 

पर वे बेमतलब हैं 

पहाड़ों पर आग लगती होगी शायद 

पर मैंने खिड़की कहाँ खोली है 

बंद हैं आँखें मेरी 

सपनों में नहीं 

अब तो ज़िंदगी चलने लगी है 

मैंने इसकी सेहत का जाम पिया था 

नये वर्ष पर 

शुभकामना भी दी थी 

अब मुझे कविता ज़रूरी नहीं लगती 

कि अच्छे-भले शब्दों को 

साथ-साथ रख दिया जाये यूँही 

मन बहलाव के लिए 

सुना आपने कविता अब 

ऊपर की या नीचे की शै हो गई है 

दूसरी श्रेणी की !


रविवार, जनवरी 21

राम

 राम 

एक शब्द नहीं है राम 

न ही कोई विचार 

बाल्मीकि के मन का 

भाव जगत की वस्तु भी 

नहीं है तुलसी के 

परे है हर शब्द, भाव व विचार से 

एक अमूर्त, निराकार 

जिसने भर दिया है 

उत्साह और उमंग 

शांति और आनंद 

ख़ुशी कोई विचार तो नहीं 

एक अहसास है 

वैसे ही राम उनके हैं 

जो महसूस करते उन्हें 

अपने आसपास हैं 

हर घड़ी हर मुहूर्त से परे 

वे सदा थे सदा हैं 

वे प्रतिष्ठित हैं 

हमें इसका अहसास करना है 

राममंदिर में विराजित 

राम लला की मूरत में

ह्रदय के 

विश्वास और श्रद्धा का 

रंग भरना है ! 



शुक्रवार, जनवरी 13

कविता

कविता 


कोई एक भाव 

एक शब्द, एक विचार 

उतर आता है न जाने कहाँ से 

और पीछे एक धारा बही आती है 

अक्सर कविता ऐसे ही कही जाती है

अनायास, अप्रयास 

कभी थम जाती है कलम तो जानना कि 

प्रवाह रुक गया है 

कि मार्ग में अवरोध है 

कोई पाहन इच्छाओं का  

या कोई दीवार द्वेष की  

नकार की बाड़ तो नहीं लग गयी 

जिन्हें हटाते ही फिर बहेगी 

कल-कल छल-छल 

काव्य की अजस्र धारा 

निरंतर भिगोती हुई अंतर व बाह्य जगत 

आलोकित होगा 

मन प्राण ही नहीं 

देह का एक-एक कण ! 


रविवार, नवंबर 29

कोई एक

 कोई एक 

युगों-युगों से बह रही है 

मानवता की अनवरत धारा 

उत्थान -पतन, युध्द और शांति के तटों पर 

रुकती, बढ़ती 

शक्तिशाली और भीरु 

समर्थ और वंचित को ले  

आह्लाद और भय का सृजन करती 

विशालकाय और सूक्ष्मतम 

दोनों को आश्रय देती सदा 

कोई एक इस धार से छिटक 

तट पर आ खड़ा होता है 

विचार की शैवाल से पृथक कर खुद 

मान्यताओं और पूर्वाग्रहों के 

भँवर से निकल 

मोतियों का मोह त्यागे 

नितांत एकाकी सूने तट पर 

देखता है बड़ी मछलियों से भयभीत हैं छोटी 

देखता है वही दोहराते हुए 

जगत पुनःपुनः निर्मित होते औ' नष्ट होते 

आवागमन के इस चक्र से वह बाहर है !


सोमवार, जुलाई 3

जीवन की शाम

जीवन की शाम 

कितने बसंत बीते...याद नहीं 
मन आज थका सा लगता

मकड़जाल जो खुद ही बुना है
और अब जिसमें दम घुटता है
जमीनें जो कभी खरीदी गयीं थी
इमारतें जो कभी बनवायी गयी थीं
जिनमें कोई नहीं रहता अब
जो कभी ख़ुशी देने की बनीं थीं सबब
अब बनी हैं जी का जंजाल
घड़ी विश्राम की आयी
 समेटना है संसार !

हाथों में अब वह ताकत नहीं
पैरों को राहों की तलाश नहीं
अब तो मन चाहता है
सुकून के दो चार पल
और तन चाहता है
इत्मीनान से बीते आज और कल
खबर नहीं परसों की भी
कौन करे बात बरसों की
बिन बुलाये चले आते हैं
कुछ अनचाहे विचार आसपास
 होने लगा है कमजोरी का अहसास

पहले की सी सुबह अब भी होती है
सूरज चढ़ता है, शाम ढलती है
पर नहीं अब दिल की हालत सम्भलती है
कितने बसंत बीते...याद नहीं 
मन आज थका सा लगता !

उन सभी बुजुर्गों को समर्पित जो वृद्ध हो चले हैं.


बुधवार, नवंबर 27

उसकी यात्रा

उसकी यात्रा



फिर लौट आया है मन  
बियाबान जंगलों में बसे गाँव में
जहाँ आबादी के नाम पर
विचारों के झुंड हैं
ऊंचे दरख्तों को चूमते
पर्वतों पर चढ़ते
 आस-पास को छूते हुए चलते
कुछ हसीन विचार.. कुछ गमगीन विचार भी
जहाँ प्रातः होते ही सूर्य उगता है
 देख सकता है मन
सात तालों से बंद कमरे में भी
सूरज की लालिमा
बादलों के बदलते रंग
 जहाँ रोज रात को चाँद निकलता है
 झरनों, नदियों, नालों पर किरणों की अठखेलियाँ
देख सकता है
रेड स्क्वायर के चारों ओर लिपटी धूप में
पंछियों को भी
सोचें जितनी हसीन होती हैं
जीना उतना ही आसान
आस-पास की कड़वाहट
छू भी नहीं पाती
जब मन मीठे दरिया के समीप होता है
कभी घनी अँधेरी गुफा में भटकता
 कभी सीमा पार कर जाता
कभी किसी गहरे समुंदर को पार करता
 कभी दूर आकाश से उतरते
पैराशूट के सहारे
हिचकोले खाता
 कभी नक्सलवादी बन न्याय मांगता
आतंक जगाता मन !

शुक्रवार, जुलाई 6

अपनी ही छाया डसती है


अपनी ही छाया डसती है

ज्यों अपनी ही छाया
ढक लेती है सम्मुख मार्ग को
जब चल पड़ते हैं हम
प्रकाश से विमुख होकर !

वैसे ही विचार
भाव से विमुख हुआ यदि  
स्वयं के आग्रहों से होता है ग्रसित
कोई नहीं है अन्य
 कोई भी नहीं
जो हो मित्र होने को उत्सुक
तो शत्रु होने की कौन कहे...?
सब कैद हैं अपनी ही छायाओं में...

हर पल जब
स्वछन्द होता है विचार
बुनियाद रख रहा होता है
एक नए संघर्ष की
जो लड़ा जायेगा भविष्य में
 जिसका भागी होना होगा स्वयं को
और देह को भी भुगतना होगा दंड
जब जब आक्रामक होगा
चाहेगा मान
खोदता ही जायेगा गढ्ढे
जिसमें गिरने ही वाला है भविष्य में
भाव की ओर मुख किया विचार
प्रकाशित होता है
कोई छाया उसके सम्मुख नहीं पड़ती
खो जाता है अनंत की आभा में...

शनिवार, अगस्त 20

मन के रूप हजार


मन के रूप हजार

मन की झील पर
जम जाता है शब्दों का शैवाल  
या ढक लेती है जल को विचारों की पत्तियां
नजर आती नहीं झील की गहराई
तब अचानक प्रज्ञा की आंधी उडा ले जाती है
पत्तों को एक किनारे या बहा देती है काई 
दूर तक और झलक उठती है
चमचमाती तलहटी !

कभी मन की भूमि पर
उग आते हैं शब्दों के जंगल
इतने घने कि पट जाती है भूमि
शुष्क पत्तों से  
प्रकाश की एक किरण नहीं पहुंच पाती
और छा जाता है सीलन भरा अंधकार
तब कोई ज्ञान की कटार से
काट देता है जंगल
उतर आती है धूप और मन खिल उठता है जीवंत !

मन की बगिया में कभी उग आते हैं
शब्दों के खरपतवार या कंटक अनचाहे
नष्ट हो जाती है समता की खेती
विचरते जहां उलझ कर फट जाते हैं
आत्मा के वस्त्र, विवेक रूपी माली आकर
उखाड़ फेंकता है खर पतवार और जला देता है कंटक
पनपते हैं पुष्प शांति, प्रेम और आनंद के...