मंगलवार, मई 18

पंछी तुम और मार्च

पंछी, तुम और मार्च

मदमाता मार्च ज्यों आया
सृष्टि फिर से नयी हो गयी
मधु के स्रोत फूट पड़ने को
नव पल्लव नव कुसुम पा गयी I

भँवरे, तितली, पंछी, पौधे
हुए बावरे सब अंतर में
कुछ रचने जग को देने कुछ
आतुर सब महकें वसंत में I

याद तुम्हें वह नन्हीं चिड़िया
नीड़ बनाने जो आयी थी
संग सहचर चंचु प्रहार कर
छिद्र तने में कर पाई थी I

वृत्ताकार गढ़ रहे घोंसला
हांफ-हांफ कर श्रम सीकर से
बारी-बारी भरे चोंच में
छीलन बाहर उड़ा रहे थे I

आज पुनः देखा दोनों को
स्मृतियाँ कुछ जागीं अंतर में
कैसे मैंने चित्र उतारे
प्रेरित कैसे किया तुम्हीं ने I

देखा करतीं थी खिड़की से
क्रीडा कौतुक उस पंछी का
‘मित्र तुम्हारा’ आया देखो
कहकर देती मुझको उकसा I

कैद कैमरे में वह पंछी
नीली गर्दन हरी पांख थी
तुमने दिल की आँख से देखा
लेंस के पीछे मेरी आँख थी I

अनिता निहालानी
२९ मार्च २०१०

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