मंगलवार, फ़रवरी 28

कब आँखें उस ओर मुड़ेगीं


कब आँखें उस ओर मुड़ेगीं

पानी मथता है संसार
बाहर ढूँढ रहा है प्यार,
फूल ढूँढने निकला खुशबू
मानव ढूँढे जग में सार !

राजा भी यहाँ लगे भिखारी
नेता भी पीछे ही चलता,
सबने गाड़े अपने खेमे
बंदर बाँट का खेल है चलता !

सही गलत का भेद खो रहा
लक्ष्मण रेखा मिटी कभी की.
मूल्यों की कोई बात न करता
गहरी नींद न टूटे जग की !

जरा जाग कर देखे कोई  
कंकर जोड़े, हीरे त्यागे,
व्यर्थ दौड़ में बही ऊर्जा
पहुँचे कहीं न वर्षों भागे !

सत्य चहुँ ओर बिखरा है
आँखें मूंदे उससे रहता,
भिक्षु मन कभी तृप्त न होता
अहंकार किस बूते करता !

हर क्षण लेकिन भीतर कोई
बैठा ही है पलक बिछाये,
कब आँखें उस ओर मुड़ेगीं
जाने कब वह शुभ दिन आये !


6 टिप्‍पणियां:

  1. जरा जाग कर देखे कोई
    कंकर जोड़े, हीरे त्यागे,
    व्यर्थ दौड़ में बही ऊर्जा
    पहुँचे कहीं न वर्षों भागे !

    जीवन की आपाधापी और मूल्यों को दिखाती सुन्दर रचना...
    सादर.

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  2. हर क्षण लेकिन भीतर कोई
    बैठा ही है पलक बिछाये,
    कब आँखें उस ओर मुड़ेगीं
    जाने कब वह शुभ दिन आये !
    बढिया प्रसतुति !!

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  3. यह रचना अपनी एक अलग विषिष्ट पहचान बनाने में सक्षम है।

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  4. हर क्षण लेकिन भीतर कोई
    बैठा ही है पलक बिछाये,
    कब आँखें उस ओर मुड़ेगीं
    जाने कब वह शुभ दिन आये !
    इंतजार है उस पल का जाने कब आये वह शुभ दिन... बहुत अच्छे भाव... शुभकामनाएं...

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  5. राजा भी यहाँ लगे भिखारी
    नेता भी पीछे ही चलता,
    सबने गाड़े अपने खेमे
    बंदर बाँट का खेल है चलता !

    सटीक बात काही है ...

    हर क्षण लेकिन भीतर कोई
    बैठा ही है पलक बिछाये,
    कब आँखें उस ओर मुड़ेगीं
    जाने कब वह शुभ दिन आये !
    अपने अंदर झांक लें तो गंदे खेल अपने आप खत्म हो जाएंगे ... बहुत सुंदर रचना

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  6. सही गलत का भेद खो रहा
    लक्ष्मण रेखा मिटी कभी की.
    मूल्यों की कोई बात न करता
    गहरी नींद न टूटे जग की !

    बेहद खुबसूरत ।

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