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शनिवार, जनवरी 25

मज़दूर

मज़दूर 


घास काटने की मशीन का शोर 

आ रहा है अनवरत 

साथ में उस तेल की गंध 

जो मज़दूर ने मशीन में डाला होगा 

जनवरी की एक सुबह 

पर धूप इतनी तेज है 

मानो दोपहर का समय हो 

मुँह को कपड़े से ढाँपे वह दत्तचित्त होकर 

काटता जा रहा है 

घरों के आगे बने बगीचों की घास 

शायद सारा दिन उसे यही करना है आज 

घास के छोटे-छोटे तिनके 

चिपक जाते हैं उसके कपड़ों पर 

शायद अभ्यस्त हो चला होगा 

उन लाखों मज़दूरों की तरह 

जो बंद फ़ैक्टरियों में काम करते हैं 

शोर और अजीब-अजीब गंधों के बीच 

या उन खदान मज़दूरों की तरह 

जो धरती से नीचे कितनी गहराई में 

ख़तरों का सामना करते हैं 

मालिकों के लिए 

सोना, चाँदी और कोयला लाकर 

उनके ख़ज़ाने भरते हैं !


शुक्रवार, अगस्त 5

डूबे हैं आकंठ

डूबे हैं आकंठ

धूसर काले मेघों से आवृत आकाश
निरंतर बरस रहा
जल की हजार धाराओं से
नहा रही हरी-भरी वसुंधरा
वृक्ष, घास, लतर, पादप
तृप्त हुए सभी डूबे हैं आकंठ
नीर के इस आवरण में ढका है दृष्टिपथ
गूँज रही है निरंतर गिरती बौछार की प्रतिध्वनि
निज नीड़ों में सिमटे चुप हैं पंछी
फिर भी बोल उठती है कभी कोकिल
अथवा कोई अन्य पांखी परों को झाड़ता हुआ
ले चुके हैं न जाने कितने कीट जल समाधि
अथवा तो धरा की गोद में उन्हें पनाह हो मिली
घास कुछ और हरी हो गयी है
नभ कुछ और काला
सावन के पहले से ही मौसम
 हुआ है सावन सा मतवाला
असम की हरियाली का यही तो राज है
ऋतुओं की रानी यहाँ वर्षा बेताज है



मंगलवार, सितंबर 2

गंगा बहकर जाये सागर

गंगा बहकर जाये सागर


घोर घटाओं में विद्युत् जब
चमक चमक लहरा कर गाती,
गिरने लगतीं बूंदें तड़ तड़
गर्जन घन की नहीं डराती !

घटाटोप सा छाता नभ पर
खो जाती वह शुभ्र नीलिमा,
दूर कहीं से हंसों की इक
पंक्ति फर से उड़ती जाती !

पवन भीग कर थिर हो जाता
हौले-हौले पात डोलते,
चहबच्चों में भर जाता जल
बूँदें गिर कर वृत्त बनातीं !

कुछ निशब्द घास पर गिरतीं
धातु पर कुछ शोर मचातीं,
ध्वनि अनेक जल धार एक है
हर शै उसकी गाथा गाती !

वृष्टि का क्रम चलता अविरत
धरा लहक लहक मुस्काती,
गंगा बहकर जाये सागर
सागर से ही जल भर लाती !




मंगलवार, अगस्त 26

ये नन्ही नन्ही चिड़ियाएँ


ये नन्ही नन्ही चिड़ियाएँ


श्वेत और श्याम पर हैं जिनके
चुन-चुन कर लाती है घास की लतरें
छोड़ आती हैं एक घन वृक्ष की
शाखाओं और पत्तियों में
एक नीड़ का फिर निर्माण हो रहा है
सृष्टि चक्र यूँ ही बहा जा रहा है
तांक-झांक करता है काग एक वहाँ आकर
जाने क्यों चिड़ियाएँ अगले ही पल नजर नहीं आतीं
शायद गयी हैं दूर लम्बी उड़ान पर
अथवा तो खोज में किसी कीट या पदार्थ के ! 

शनिवार, जनवरी 4

अब तो कुछ बात हो

अब तो कुछ बात हो


फूलों से बात करें, बिछौना बने घास
डालियों के साथ झूमें, निहारें आस-पास

चाँद संग होड़ लगे, चाँदनी संग हम भी जगें
सो लिए बरसों बरस, अब तो प्रमाद छंटे

जीवन को मांग लें, अनकही प्रीत को
सीख लें कुदरत से, बंटने की रीत को

स्वप्नों को तोड़ दें, सच से मुलाकात हो
भरमाते उम्र बीती, अब तो कुछ बात हो

आँखों में डाल आँखें, खुद से भी मिलें कभी
होना ही काफी है, बन न कुछ पाए कभी

होकर ही जानेंगे, कुदरत का हैं हिस्सा
जाने कब आँख मुँदे, बन जाएँगे किस्सा


शुक्रवार, दिसंबर 13

पावनी प्रकृति

पावनी प्रकृति

ठंड एकाएक बढ़ गयी थी 
ढक लिया परिवेश को
 कुहरे की घनी चादर ने
वृक्ष के नीचे टपक रही बूँदे
भीगा था घास का हर तिनका
उसने अलाव में जलती लकड़ियों को
 थोड़ा आगे खिसका दिया
 लपेट लिया कम्बल को चारों ओर
मैला-कुचैला उसका कुत्ता भी
थोड़ा नजदीक सरक आया  
 और तभी हवा के तेज झोंके से
खुल गया उसकी झोंपड़ी का किवाड़  
हिमपात हो रहा था बाहर
श्वेत कतरे उतर रहे थे हौले हौले
धरा को संवारने आए हों जैसे
दरख्तों ने ओढ़ ली थी श्वेत चादर
रस्ते खो गये थे और एक सी लग रही थीं
 मकानों की छतें
भूल गया वह किवाड़ बंद करना
देखने लगा एकटक
प्रकृति के इस खेल को
इस मौसम की यह पहली बर्फ है
कितनी मोहक और पवित्र  
खड़े-खड़े हाथ जोड़ दिए उसने !