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मंगलवार, दिसंबर 6

सुदूर कहीं ज्योति की नगरी

सुदूर कहीं ज्योति की नगरी 


झांक रहा कोई भीतर से 

भारी पर्दे क्यों लटकाए, 

बाहर अबद्ध  गगन बुलाता 

  पिंजरे में विहग घबराए !


विमुक्त करो मानस शक्ति को 

जो अनंत बन खिलना चाहे, 

संकरे पथ सीली धरा  को 

तज भूमा से मिलना चाहे !


वक्त बीतता जाता है अब 

पल भर भी की ना  देर करो, 

रस्ता दो उर की  नदिया को 

अब सिंधु मिलन की टेर भरो !


पलकों में सुख  स्वपन क़ैद हैं 

हृदय कमल भी सुप्त हैं अभी, 

सुदूर कहीं ज्योति की नगरी 

गहन तिमिर में पड़े हैं सभी !


अब राहों को खुद गढ़ना है 

नियति स्वयं  हाथों में लेकर, 

सोए-सोए युग बीते हैं 

स्वर्णिम पथ पर जाना जगकर !




शनिवार, दिसंबर 11

अपने दिल का द्वार खोल दें

अपने दिल का द्वार खोल दें


आज वक्त से वादा कर लें 

नव विश्वास आस नव भर लें, 

हर सिलवट को झाड़ मनों से 

जीवन पथ उजियाला कर लें !


चंद घड़ी जो पास हमारे 

तंद्रा-नींद  तमस न घेरे,  

पल-पल उसका सदा सँवारें 

अकर्मण्यता न डाले डेरे !


मन सपनों में ‘कोई’ जागा 

 टूटे नहीं कभी वह धागा, 

जिसमें कृष्ण पिरोए जग को 

तुलसी सहज विमल अनुरागा !


उसी एक का साथ मिले अब 

गरल भी अमृत बनकर छलके, 

खो जाए पीड़ा अभाव तब

पथ की हर बाधा वह हर ले !


द्वार खुला है निशदिन उसका 

अपने दिल का द्वार खोल दें, 

बरस रहा जो मधु फुहार  बन 

हटा आवरण उर में भर लें !




गुरुवार, दिसंबर 26

वक्त चुराना होगा

नया वर्ष आने पर हम हर बार संकल्प लेते हैं, नियमित भ्रमण और व्यायाम करेंगे, नियमित योग और ध्यान करेंगे, नियमित अध्ययन और लेखन करेंगे, किन्तु कुछ दिनों बाद जब जीवन अपने पुराने क्रम में आ जाता है तो सबसे पहले यही शब्द निकलते हैं, क्या करें समय ही नहीं मिलता. मुझे लगता है आने वाले वर्ष में यदि हम जीवन में कुछ सकारात्मक बदलाव चाहते हैं तो हमें अपने लिए कुछ वक्त चुराना होगा।


वक्त चुराना होगा !

काल की तरनि बहती जाती 
तकता तट पर कोई प्यासा,
सावन झरता झर-झर नभ से 
मरुथल फिर भी रहे उदासा ! 

झुक कर अंजुलि भर अमृत का भोग लगाना होगा 
वक्त चुराना होगा !

समय गुजर ना जाए यूँ ही 
अंकुर अभी नहीं फूटा है,
सिंचित कर लें मन माटी को 
अंतर्मन में बीज पड़ा है !

कितने रैन-बसेरे छूटे यहाँ से जाना होगा 
वक्त चुराना होगा !

कोई हाथ बढ़ाता प्रतिपल 
जाने कहाँ भटकता है मन, 
मदहोशी में डुबा रहा है 
मृग मरीचिका का आकर्षण !

उस अनन्त में उड़ना है तो सांत भुलाना होगा 
वक्त चुराना होगा !

जग की नैया सदा डोलती 
हिचकोले भी कभी लुभाते, 
जिन रस्तों से तोबा की थी 
लौट-लौट कर उन पर आते !

नई राह चुनकर फिर उस पर कदम बढ़ाना होगा 
वक्त चुराना होगा !



शनिवार, जनवरी 2

नया साल मुबारक हो

नया साल

घड़ी की सुईयां जब आधी रात को मिलेंगी
विदा हो जायेगा वक्त का एक वह टुकड़ा
जिसे नाम दिया है हमने ‘दो हजार पन्द्रह’
...और सुगबुगा कर आँख खोलेगा एक नया कालखंड
दिखाकर अपना सुनहरा मुखड़ा !

नये वर्ष में होंगे नए दिन और नयी रातें
नये सूर्योदयों और नव चन्द्रमा से होंगी मुलाकातें
आज तक नहीं घटा सृष्टि में
नया वर्ष उन दिनों, हफ्तों और महीनों को घटायेगा
नये वर्ष में हर फूल पहली बार मुस्कुराएगा
नया इरादा फिर क्यों न करें
नया वादा भी अपने आप से
नये संकल्प कर मनों में
नव शक्ति भरें शुभ जाप से !

पुरानी पर स्वयं के लिए नव, संस्कृति से पहचान करें
जिनसे नहीं मिले बरसों से
उन इतिहास के पन्नों से जान-पहचान करें
नया परिचय हो अपने पुराने देश से
डाल आँखों में आँख मिलें चहूँ परिवेश से
बरसों से भूले हैं काम वे नये करें
नये कुछ मित्र बनें, नये कुछ रंग भरें
आदतों में कैद जो जीवन घट रीत रहा
नये संकल्प भर इसमें नव राग भरें !

बीत गया वक्त जो यादों में बोझ बना
रख दें उतार पल में
अंतर को खाली करें
नये स्वप्नों का करने स्वागत
 लायेगा जो वर्ष आगत  
नव वर्ष कुछ नया तो लायेगा
जीवन कुछ और ढंग से गुनगुनाएगा
धरा उसी तरह चक्कर लगाएगी सूर्य का
पर सूर्य कुछ और वृद्ध हो जायेगा
नये इरादों के पहन कवच
क्यों न उतरें समय की इस भंवर में
नये वर्ष में सराबोर हो जाएँ
उत्साह और उमंग की लहर में !

मंगलवार, दिसंबर 29

जाता हुआ वर्ष

जाता हुआ वर्ष

वक्त का पहिया आगे कुछ सरक गया
अनगिन सौगात दे और एक बरस गया

दुनिया में युद्ध कहीं शांति की बात हुई
पारा कुछ और चढ़ा भारी बरसात हुई

बदलीं निष्ठाएं कुछ सत्ताए भी छिनीं 
सहनशीलता घटी अफवाहें भी बुनीं

तेवर शीतल हुए मंदी की मार पड़ी
योगमय हुआ विश्व ध्यान की लहर बढ़ी

सीरिया में रक्त बहा बेघर को घर मिला
द्वार खुले ही मिले जहाँ गया काफिला

आई एस का जुल्म बढ़ा दूरियां भी घटीं
समीकरण बने नये मित्रता को शक्ल दी

विष बढ़ा वायु में विकास महंगा पड़ा
जाता हुआ यह बरस दे कई सबक गया 

गुरुवार, सितंबर 5

वक्त की चादर


वक्त की चादर


सामने बिछी है वक्त की चादर
अपनी चाहतों के बूटे काढ़ सको
तो काढ़ लो !
क्योंकि वक्त..
मुट्ठी से रेत की तरह
फिसल जायेगा
 और फिर कीमत चुकानी होगी
निज स्वप्नों से !

सुंदर, श्वेत चादर पर
 रंगीन बूटे
हौसला बढ़ाएंगे दूर तक
साथ रहेगी उनकी सुघड़ता
खुशनुमा हो जाएगा  सफर
 रेशमी धागों की सरसराहट से !

 सिमट जाये ये चादर इसके पूर्व
 उकेर दो... अपनी चाहतों के बूटे !



शनिवार, फ़रवरी 9

उसी घड़ी में कुछ घट जाता


उसी घड़ी में कुछ घट जाता 



वक्त का दरिया बहता जाता
यूँ लगता कुछ कहता जाता !

कल का सूरज कहाँ खो गया
आयेगा जो किधर से आये,
अभी “अभी” था अभी हुआ मृत
किसी अतल में गुमता जाता !

दूर सितारों से गर देखें
धरा गेंद सी डोल रही है,
एक आवरण में लिपटी सी
भेद किसी के खोल रही है !

सब कुछ पल में थिर हो जैसे
समय की रेखायें मिट जाये,
एक सनातन सृष्टि मिलती
क्षण भर को गतियाँ थम जाएँ !

उसी घड़ी में कुछ घट जाता
वक्त का दरिया रुक मुस्काता !



गुरुवार, नवंबर 1

जीवन की नदी




जीवन की नदी

सुख और दुःख के दो तटों के मध्य
जीवन की नदी बहती है
कभी उथली, कभी गंदली
कभी दीपों, फूलों से भरी
जाने कितने जीवन आए, चले गए
वक्त के थपेडों में छले गए
कभी कोई जीवन थम कर निहारता है खुद को
तो सुख-दुःख के तटों पर नहीं उतरता अब
बहता ही चला जाता है
अनजान राहों पर.. अनंत की तलाश में
वही पाता है कि
श्वास और मौन के तट उग आए हैं
उसके दोनों और
जिनके बीच मन की नदी बहती है...

(यह कविता मन की नदी का पूर्वार्ध है, पर यह बाद में लिखा गया)

शुक्रवार, दिसंबर 5

वक्त आज है खराब

वक्त आज है ख़राब!

दस हफ्तों से था
जिस का इंतजार
आज भी आया नहीं
उस खत का जवाब
वक्त आज है खराब !

जाना है जरुरी
बरसे हैं बादल क्यों 
जाने बेहिसाब
वक्त आज है खराब !

सँवारा था जिसे
बिगड़ा वही हर काम
दिए बिना सबाब
वक्त आज है खराब !

हर कोई डाले 
है जाने क्यों हम पर 
झूठ मूठ रुआब
वक्त आज है खराब !