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सोमवार, मई 25

छूट गयी जब “मैं”

छूट गयी जब “मैं”



छूट गयीं सहज

 सारी व्यस्तताएँ

छूट गयी जब मैं,


सारे जहान का समय 

अब जैसे हाथों में आ गया

छूट गयी जब मैं !


कुछ भी करने को नहीं 

 अनंत वक्त अपनी मुट्ठी में

बेफिक्री मन ने कैसी पायी है

छूट गयी जब मैं !


 जैसे फूल होता है

अस्तित्त्व मन का ऐसा ही है

जग तय करता है

उपयोगिता उसकी...

वह  खिलता है 

बस अपनी मौज में

यह तन जहाँ भी रहे, 

काम आये जग के

वाणी हो उपयोगी

और ये हाथ उगायें फूल 

या लिखें कविता !

छूट गयी जब मैं !


मन का अब पता ही नहीं चलता

जैसे रवि  के आते ही 

अंधकार का

छूट गए सारे दुराग्रह 

सारी पकड़ भी छूट गयी....

अब भीतर मीलों तक

 चैन बिछा है

अनंत शांति !

छूट गयी जब मैं !


आज समय ही समय है....

जन्मों का यायावर 

घर लौट आया है

अब न उठानी चाह की गठरी

और न ही चलना पड़े 

किसी अगले पड़ाव को

जिस पार उतरने की आस 

लगाये था मन

दौड़ता फिर रहा था

 आ पहुँचा है

खत्म हो गयी सारी आपाधापी

और भीतर सब खाली है

वहाँ कोई भी नहीं रहता, 

यात्री लौट गया

पंछी उड़ गया

छूट गयी जब मैं !

 

बुधवार, मार्च 24

समय

समय 


‘समय ठहर गया है’ 

जब कहता है कोई 

तो एक सत्य से उसका परिचय होता है 

समय ठहरा ही हुआ है अनंत काल से ! 

गतिमान वस्तुएं 

उसके चलने का भ्रम पैदा कर देती हैं !


‘समय भाग रहा है’ 

कहता है जब कोई 

वह एक अन्य तथ्य को दर्शाता है 

भाग रहा है उसका मन 

 किसी न किसी शै के पीछे !


‘समय उड़ता हुआ सा लगता है’ 

जब कोई आनंदित होता है 

और ठहर जाता है खुद में !


‘काटे नहीं कटता जब समय’ 

कोई अंधेरे में भटक रहा है 

अपनी पीड़ा को टाँक देता है समय पर !


समय कम है उसके लिए जो महत्वाकांक्षी है 

समय खराब है उसके लिए जो भाग्यवादी है 

समय अच्छा है आशावादी के लिए 

हर समय समान नहीं होता यथार्थवादी के लिए !


ज्ञानी जानता है 

समय एक कल्पना है 

वास्तव में एक बार में एक ही क्षण

 मिलता है जीने के लिए !



 

मंगलवार, दिसंबर 22

जब नया साल आने को है

जब नया साल आने को है 
 हर भोर नयी हर दिवस नया 
हर साँझ नयी हर चाँद नया,
हर अनुभुव भी पृथक पूर्व से 
हर स्वप्न लिए संदेश नया !

हम बंधे  हुए इक लीक चलें 
प्रतिबिम्ब कैद ज्यों दर्पण में,
समय चक्र आगे बढ़ता पर 
ठिठक वहीं रह जाते तकते !

नयी चुनौती, नव उम्मीदें 
करें सामना नई ललक से, 
बीता कल जो कहीं खो गया 
आने वाला उसे सराहें !

जब नया साल आने को है 
नव आशा ज्योति जगे उर में, 
जो सीख मिली धारें, मन को 
खोलें हर दिन नव चाबी से !


गुरुवार, नवंबर 5

समय या भ्रम

समय या भ्रम

 


समय जो निरंतर गतिमान है

क्या वाकई गति करता है?

या घटनाएं ही ऐसा प्रतीत कराती हैं

दिन और रात

माह और वर्ष

जन्म और मृत्यु

के मध्य समय बहता सा लगता है

 पर देखने वाला सदा एक सा रहता है !

रेत पर धँसे पाँव ज्यों

कहीं जाते से प्रतीत होते हैं

लहर आकर चली जाती है

वे वहीं के वहीं रहते हैं !

इतिहास बनता रहता है

व्यक्ति वही रहता है

कभी भयभीत, कभी निर्भीक,

कभी शोषक अथवा कभी शोषित

महामारी फिर-फिर दोहराती है

युद्ध भी लड़े जाते हैं बार-बार

जो भी बदलता है वह भ्रम ही सिद्ध होता है

एक पर्दा है जैसे जिस पर

घट रहा है सब कुछ

शायद गहराई में हर मन जानता है

यह एक दोहराया जाने वाला खेल है

 और वह इसमें व्यर्थ ही फंस गया है

सदा से है वह यहीं

वह कहीं गया ही नहीं

सारा भय ऊपर-ऊपर है

विचार में या भावना में

कुछ छूट जाने का भय

कुछ न कर पाने का भय

मारे जाने का भय

जो कंपता है वह प्रतिबिंब है

चाँद को कुछ नहीं होता

मछली के जाल में वह कभी फंसा ही नहीं

बस मान लिया है

सारा समय इस एक क्षण में समाया है

शेष सब..  कुछ छाया और कुछ माया है !

 


गुरुवार, दिसंबर 26

वक्त चुराना होगा

नया वर्ष आने पर हम हर बार संकल्प लेते हैं, नियमित भ्रमण और व्यायाम करेंगे, नियमित योग और ध्यान करेंगे, नियमित अध्ययन और लेखन करेंगे, किन्तु कुछ दिनों बाद जब जीवन अपने पुराने क्रम में आ जाता है तो सबसे पहले यही शब्द निकलते हैं, क्या करें समय ही नहीं मिलता. मुझे लगता है आने वाले वर्ष में यदि हम जीवन में कुछ सकारात्मक बदलाव चाहते हैं तो हमें अपने लिए कुछ वक्त चुराना होगा।


वक्त चुराना होगा !

काल की तरनि बहती जाती 
तकता तट पर कोई प्यासा,
सावन झरता झर-झर नभ से 
मरुथल फिर भी रहे उदासा ! 

झुक कर अंजुलि भर अमृत का भोग लगाना होगा 
वक्त चुराना होगा !

समय गुजर ना जाए यूँ ही 
अंकुर अभी नहीं फूटा है,
सिंचित कर लें मन माटी को 
अंतर्मन में बीज पड़ा है !

कितने रैन-बसेरे छूटे यहाँ से जाना होगा 
वक्त चुराना होगा !

कोई हाथ बढ़ाता प्रतिपल 
जाने कहाँ भटकता है मन, 
मदहोशी में डुबा रहा है 
मृग मरीचिका का आकर्षण !

उस अनन्त में उड़ना है तो सांत भुलाना होगा 
वक्त चुराना होगा !

जग की नैया सदा डोलती 
हिचकोले भी कभी लुभाते, 
जिन रस्तों से तोबा की थी 
लौट-लौट कर उन पर आते !

नई राह चुनकर फिर उस पर कदम बढ़ाना होगा 
वक्त चुराना होगा !



शुक्रवार, दिसंबर 15

कितनी धूप छुए बिन गुजरी


कितनी धूप छुए बिन गुजरी


कितना नीर बहा अम्बर से
कितने कुसुम उगे उपवन में,
बिना खिले ही दफन हो गयीं
कितनी मुस्कानें अंतर में !

कितनी धूप छुए बिन गुजरी
कितना गगन न आया हिस्से,
मुंदे नयन रहे कर्ण अनसुने
बुन सकते थे कितने किस्से !

कितने दिवस डाकिया लाया
कहाँ खो गये बिन बाँचे ही,
कितनी रातें सूनी बीतीं
कल के स्वप्न बिना देखे ही !  

नहीं किसी की राह देखता
समय अश्व दौड़े जाता है,
कोई कान धरे न उस पर
सुमधुर गीत रचे जाता है !

मंगलवार, अक्टूबर 13

शुभकामनायें



शुभकामनायें 

समय के कुंड में.. डलती रही
प्रीत की समिधा
दो तटों के मध्य में.. बहती रही
प्रीत की सलिला
बीत गये चार दशक कई पड़ाव आए
पुहुप कितने भाव से जग में उगाए
भाव सुरभि है बिखरती
नव कलिकायें विहंसती
जिंदगी अब खिल रही है
चल रहा है इक सफर
मीत मन का साथ हो तो
सहज हो जाती डगर !
लें बधाई आज दिल में
स्वप्न की ज्योति जलेगी  
 मिल मनाएंगे दिवस फिर
जब जयंती स्वर्ण होगी !

शनिवार, फ़रवरी 9

उसी घड़ी में कुछ घट जाता


उसी घड़ी में कुछ घट जाता 



वक्त का दरिया बहता जाता
यूँ लगता कुछ कहता जाता !

कल का सूरज कहाँ खो गया
आयेगा जो किधर से आये,
अभी अभी था अभी हुआ मृत
किसी अतल में गुमता जाता !

दूर सितारों से गर देखें
धरा गेंद सी डोल रही है,
एक आवरण में लिपटी सी
भेद किसी के खोल रही है !

सब कुछ पल में थिर हो जैसे
समय की रेखायें मिट जाये,
एक सनातन सृष्टि मिलती
क्षण भर को गतियाँ थम जाएँ !

उसी घड़ी में कुछ घट जाता
वक्त का दरिया रुक मुस्काता !



रविवार, सितंबर 9

कवयित्री शिखा कौशिक का काव्य संसार- खामोश, ख़ामोशी और हम में


खामोश ख़ामोशी और हम की अगली कवयित्री हैं, उत्तर प्रदेश की शिखा कौशिक जिनके ब्लॉग पर सुंदर कवितायें तथा स्वरचित गीत सुनने को मिलते हैं. शिखा जी शोधार्थी हैं और हिंदी के महिला उपन्यासकारों के उपन्यासों में स्त्री विमर्श पर शोध कर रही हैं. इनके माता-पिता वकील हैं.
इस संकलन में कवयित्री की छह कवितायें हैं, परम के प्रति आस्था को व्यक्त करती मैं कतरा हूँ, तथा आत्मशक्ति पर विश्वास, प्रकृति के सुंदर रूपों का वर्णन करती राजतिलक, काल की पहचान करने का प्रयास है समय में, जिंदगी क्या है तथा सड़क में उसी को गवाह बनाकर जीवन को समझने की कोशिश, इनकी कविताओं को नए-नए रंगों से भर देती है.

कवि का अर्थ ही है जो जमाने भर का दर्द अपने भीतर महसूस करे और उसे शब्दों के माध्यम से व्यक्त करे, मैं कतरा हूँ कविता में इसी प्रार्थना को भाव भरे शब्दों में प्रस्तुत किया है

किसी की आंख का आँसू
मेरी आँखों में आ छलके
किसी की साँस थमते देख
मेरा दिल चले थम के
..
प्रभु ऐसे ही भावों से मेरे
इस दिल को तुम भर दो
मैं कतरा हूँ मुझे इंसानियत
का दरिया तुम कर दो

किसी का खून बहता देख
मेरा खून जम जाये
किसी की चीख पर मेरे
कदम उस और बढ़ जाये
..
मैं कतरा हूँ मुझे इंसानियत
का दरिया तुम कर दो

आशा और विश्वास ही जीवन को हादसों से गुजरने का बल देते हैं, आत्मशक्ति पर विश्वास हो तो बाधाएं कुछ नहीं कर सकतीं-

राह कितनी भी कुटिल हो 
हमें चलना है
हार भी हो जाये तो भी
मुस्कुराना है
...
हादसों के बीच से
इस तरह निकल जाना है
..
रात कितनी भी बड़ी हो
सवेरा तो होना है

सुबह से लेकर रात तक प्रकृति न जाने कितने रूप और आकार लेती है...निशा-सुन्दरी का राजतिलक पाठक को एक अनोखे भावलोक में ले जाता है.

उषाकाल
उदित होता दिनकर
नीलाम्बर लालिमा लिए
पक्षियों का कलरव
मंदिरों की घंटियों
की मधुर ध्वनि
..
मध्याहन का समय
जीवन में गति
..
सायन्तिका का आगमन
लौटते घर को
कदमों की आवाज
शांत जल
टिमटिमाते तारों का समूह
सुगन्धित समीर
निशा-सुन्दरी का
राजतिलक

काल को हम जानते हुए भी नहीं जानते...समय में कवयित्री द्वारा पल-पल बहती समय की धारा के साथ बहने का प्रयास किया गया है...

कुछ छूटता-सा
दूर जाता हुआ
बार-बार याद आकर
रुलाता सा
क्या है
मैं नहीं जानती
कुछ सरकता-सा
कुछ बिखरता-सा
कुछ फिसलता-सा
कुछ पलटता-सा
..
धीरे धीरे आगे बढता हुआ
हमारे हाथों से निकलता हुआ
कभी अच्छा कभी बुरा
हाँ! ये समय ही है!

जीवन की राह हो या शहर की सड़क, दोनों पर चलना होता है मानव को और साक्षी होता है पथ..

मैं सड़क हूँ, मैं गवाह हूँ
आपके गम और खुशी की
है नहीं कोई सगा पर
मैं सगी हूँ हर किसी की
..
मुझपे बिखरे रंग ये होली के देखो
मुझपे बिखरा खून ये दंगों का देखो
..
मैं गवाह आंसू की हूँ और कहकहों की
..
मंदिरों तक जा रहे मुझपे ही चलकर
मैं गरीबों को सुलाती थपकी देकर
..
मैं सड़क हूँ, मैं गवाह हूँ
आपके गम और खुशी की

कवयित्री की अंतिम कविता है जिंदगी क्या है, जो शब्दों की सुंदर पुनरुक्ति तथा प्रवाहमयी भाषा के कारण हृदय को छूती है-

जिंदगी क्या है?
खुशी के दो-चार पल
खुशी क्या है
हृदय में उठती तरंगों की हलचल
हृदय क्या है
..
संसार क्या है
दुखों का भंडार
दुःख क्या है
सुख की अनुपस्थिति
...
मनचाहा क्या है
खुशहाल जिंदगी
जिंदगी क्या है
खुशी के दो चार पल

शिखा कौशिक जी की कवितायें सहज और सरल भाषा तथा जीवन के विविध रंगों को अपनी विषय वस्तु बनाने के कारण अपनी अलग पहचान रखती हैं. इनके लिए मैं कवयित्री को बधाई देती हूँ, तथा आशा करती हूँ कि सुधी पाठक जन भी इन्हें पढकर आह्लादित होंगे, व अपनी प्रतिक्रियाओं द्वारा इसकी सूचना भी देंगे.