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बुधवार, जनवरी 22

समाधि का फूल

समाधि का फूल

“जब गिर जाएगी झूठ की आखिरी दीवार भी भीतर 
सुडौल हो जायेगा भावनाओं का नुकीला पत्थर घिसते-घिसते 
जो चुभ जाता था खुद को और चुभाया जाता था दूसरों को 
जब तृप्त हो जाएगी मन की आखिरी वासना भी 
जीने की, यश और साहचर्य की 
“जब गिर जाएगी झूठ की आखिरी दीवार भी भीतर सुडौल हो जायेगा भावनाओं का नुकीला पत्थर घिसते-घिसते जो चुभ जाता था खुद को और चुभाया जाता था दूसरों को जब तृप्त हो जाएगी मन की आखिरी वासना भी जीने की, यश और साहचर्य की जब उत्तेजना के साधन नहीं जुटाने होंगे मन के शावक को तृप्त होगा वह उस कोमल शिशु की भांति जो जल की अनंत राशि पर लेटा तिरता है जब ऐसा होगा तो समाधि का फूल खिलेगा” कहा गुरू ने पूछा शिष्य ने, “जब तक खिले न समाधि का फूल, कोई ऐसा कैसे हो सकता है ? देख पायेगा वही भीतर असत्य का धुआं जो जाग गया है आत्मकामी होना बिना असीम सुख को पाए सम्भव ही नहीं “ गुरू ने एक फूल दिया शिष्य को और पूछा, “यह पहले खिला या सहे इसने बीज से फूल होने की यात्रा के दंश मिटाया अपने अस्तित्व को सही धूप और बारिश की मार वह बीज तुम हो ! समाधि का फूल जो खिलेगा एक दिन उसकी संभावना भीतर लिए हो !”

बुधवार, सितंबर 21

जहां प्रीत की गागर ढुलके


जहां प्रीत की गागर ढुलके

खो जाते हैं प्रश्न जहां सब
एक प्रकाश ही दिपदिप करता,
समाधान हो जाता मन का
कोई सरस प्रेम है भरता !

सीमाएं मिट जातीं सारी
हम अनंत में दौड लगाते,
पल में सारे नक्षत्रों का
भ्रमण किये फिर वापस आते !

कण-कण जग का भेद खोलता
तन भी पिघल-पिघल ज्यों जाता,
मन का तो कुछ पता न चलता
एक ही तत्व नजर बस आता !

वह परम, वह अपना प्रियतम
बाट जोहता कब घर लौटें,
बार-बार भेजे संदेशे
कब अपना बिखराव समेटें !

जाने कौन से लोभ की खातिर
माया पंक में हम डूबे हैं,
अब तक तो कुछ चैन न पाया
बांधे कितने मंसूबे हैं !

भीतर ही वह देश अनोखा
जहां सरसता टपटप टपके,
जहां जले हैं दीप हजारों
जहां प्रीत की गागर ढुलके !

गुरुवार, जून 24

समाधि

समाधि

मन के पीछे.. पीछे.. पीछे..
चलो वहाँ पर ऑंखें मींचे,
जहाँ विचार न कोई उठता
भाव भी कोई नहीं उमड़ता !

जहाँ प्रकाश का फूल खिला है
सुर का भीना स्रोत मिला है,
उस गह्वर में पल भर रुकना
वहीं अगोचर का हो लखना !

उठती वहीं से 'मैं' की तान
गति पाते हैं पांचों प्राण,
वहीं से डलता जाल जगत में
न चाहो तो समेटो पल में !

उस ही का विस्तार हुआ है
भाव और विचार हुआ है,
वही चाह न चाह कर फंसता
वही मुक्त हृदय से हँसता !

लीला रचता निज शक्ति से
खो जाता विमुख भक्ति से,
कोई आकर याद दिलाता
खुद को फिर खुद में पा जाता !

पुलक वही आँखों में अश्रु
धनक वही पावों में घुंघरू,
गीत वही कंठों में सरगम
प्रिय वही अंतर में प्रियतम !

अनिता निहालानी
२३ जून १०१०