सोमवार, जनवरी 3

लगन एक की भीतर गहरी

लगन एक की भीतर गहरी


काँव-काँव कौवे की दिन भर
मगर कोकिला सुबह साँझ ही,
बगुले बन बन डोला करते
राजहंस तिरते कैलास ही !

सारहीन से भरा है यह जग
सार छिपा ढूंढे से मिलता,
सीप हजारों हैं सागर में
किसी किसी में मोती खिलता !

दिल की दौलत वाले हैं कम
लाखों निर्धन रोया करते,
जीवन का जो असली धन है
पल पल उसको खोया करते !

है अरूप भी छिपा रूप में
सत्य वही शेष छाया है,
हाथ न आयेगा अनाम वह
भरमाती जब तक माया है !

राह पकड़ लें यदि एक हम
मंजिल स्वयं घर तक आयेगी,
लगन एक की भीतर गहरी
उसका पता बता जायेगी !

अनिता निहालानी
३ जनवरी २०११
  

5 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय अनिता जी
    नमस्कार !
    ..........दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती
    खुशियों भरा हो साल नया आपके लिए
    "माफ़ी"--बहुत दिनों से आपकी पोस्ट न पढ पाने के लिए ...

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  2. राह पकड़ लें यदि एक हम मंजिल स्वयं घर तक आयेगी, लगन एक की भीतर गहरी उसका पता बता जायेगी !

    kashh wo raah ham pakar payen....waise ye sach hai, manjil jarur mil jayegi...:)


    bahut gahri rachna...kitna pyara bimb apne prayog kiya kauye ki kanw kanw, ..........

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  3. अनीता जी,

    बहुत अर्थपूर्ण रचना है......हमेशा की तरह लाजवाब......ये पंक्तियाँ बहुत पसंद आयीं-

    दिल की दौलत वाले हैं कम
    लाखों निर्धन रोया करते,
    जीवन का जो असली धन है
    पल पल उसको खोया करते !

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  4. राह पकड़ लें यदि एक हम मंजिल स्वयं घर तक आयेगी, लगन एक की भीतर गहरी उसका पता बता जायेगी !


    .बहुत सुंदर रचना -
    प्रेरणा दाई भी -

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  5. "...राह पकड़ लें यदि एक हम मंजिल स्वयं घर तक आयेगी,
    लगन एक की भीतर गहरी उसका पता बता जायेगी ! "

    कविता बहुत ही प्रेरक सन्देश देती है.

    सादर

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