बुधवार, जनवरी 5

असजग हम

असजग हम

हम अपने इन्हीं हाथों से
चुनते हैं दीवारें
और फिर कैद कर लेते हैं खुद को !

खोदते हैं गड्ढे बड़ी मेहनत से
फिर आँख मूंदकर चलते हैं
ताकि हो सकें दफन उनकी गहराइयों में !

स्वयं लगाते हैं काँटों की बाड़
विषैले फलों वाले वृक्ष
ताकि फटें हमारे दामन उनमें उलझ  
रुंधे हमारे गले उन्हें खाकर !

हम खुद ही बनाते हैं घर
ऊँचे पहाड़ों पर
भटकते हैं फिर तूफानों में
पनाह पाने तक !

पथरीले पथ गढ़ते हैं
इन्हीं हाथों से
करने लहुलुहान खुद को

होता है यह सब हमसे
क्यों कि बेहोश हैं हम !

अनिता निहालानी
५ जनवरी २०११

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

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  2. अनीता जी,

    जीवन का सार छिपा है इस कविता में....न कोई था और न कोई होगा .....सिर्फ तुम ही सबके लिए उत्तरदायी हो.....वाह

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  3. इमरान जी,आपने कितना सही समझा है हमारे सारे सुखों और दुखों के लिये हम ही उत्तरदायी हैं, जिसने इसका अनुभव कर लिया उसी क्षण से उसके जीवन में समरसता अने लगती है क्योंकि अपने को भला कोई क्यों सताएगा ?

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