शुक्रवार, फ़रवरी 18

मन होता है

मन होता है

कोमल रंग भावनाओं के
कुछ नीले गगन पे उकेरूँ,
सारी धरती भर जाये फिर
सच्चाई के बीज बिखेरूं !

छंटे अँधेरा हर इक मन का
कुछ पल मैं सूरज बन जाऊँ,
सहज स्नेह फूटे अंतर में
ऐसे सुंदर गीत सुनाऊँ !

टूटे दिल जुड़ जाएँ फिर से
मैं हर इक को आस बधाऊँ
अंतर में सोई श्रद्धा को
भेज भेज संदेश जगाऊँ !

अनिता निहालानी
१८ फरवरी २०११

5 टिप्‍पणियां:

  1. टूटे दिल जुड़ जाएँ फिर से मैं हर इक को आस बधाऊँअंतर में सोई श्रद्धा को भेज भेज संदेश जगाऊँ !-बहुत ही मीठी भावना,विश्वास है एक दिन ऐसा हो जायेगा.

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  2. सारी धरती भर जाये फिर
    सच्चाई के बीज बिखेरूं !

    सुन्दर भाव ..अच्छी रचना

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  3. बहुत ही अच्छी भावनाओं को आपने कुछ लाइनें दी हैं । पढ़कर बहुत अच्छा लगा । धन्यवाद एवं शुभकामनाएँ !

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  4. अनीता जी, बहुत सुंदर विचार हैं। मन प्रसन्‍न हो गया। बधाई स्‍वीकारें।

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    ब्‍लॉगवाणी: ब्‍लॉग समीक्षा का एक विनम्र प्रयास।

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  5. बहुत प्रेरणा देती हुई सुन्दर रचना ...

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