सोमवार, फ़रवरी 14

तुम कितने अच्छे लगते हो

तुम कितने अच्छे लगते हो

कण-कण में तुम व्याप रहे हो
प्रेम नीर बन सदा बहे हो,
हर दिल में तुम ही बसते हो
तुम कितने अच्छे लगते हो !

धरा, गगन के अंतराल में
फांसा करते जीव जाल में,
पवन, अगन में छुपे हुए हो,
मन, बुद्धि में रमे हुए हो !

युग-युग से पूजते पुजारी
अचरज लेकिन कितना भारी,
 सदा कृपा का जल बरसाते
नजर नहीं किसी को आते !

स्वप्नों में देखा है तुमको
दिलवालों ने पाया तुमको,
हाथ सदा आती है छाया
आँख खुली तो जग की माया !


अनिता निहालानी
१४ फरवरी २०११   

9 टिप्‍पणियां:

  1. अनीता जी,

    प्रत्येक पंक्ति बेहतरीन.....बहुत सुन्दर|

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  2. धरा, गगन के अंतराल में फांसा करते जीव जाल में,--ये वाली पंक्ति चुभती है. सदा कृपा का जल बरसाते ,चुभन शांत करती है.

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  3. आपकी रचना मन को सूक्ष्म कर देता है ..एक प्रार्थना उठने लगती है ..आपको कोटि-कोटि धन्यवाद ..

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  4. बहुत सुन्दर..आपकी रचनायें अपनी गहराई में पूरी तरह डुबो देती हैं..आभार.

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  5. प्रेमपरक बहुत सुन्दर छंद बद्ध कविता है आपकी.

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  6. आप सभी का आभार एवं धन्यवाद!

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