गुरुवार, फ़रवरी 17

बस यह अंतिम प्रयास हो

बस यह अंतिम प्रयास हो


जल जाये, हमारी अशुभ कर्मों की वासना
जल जाये
तुम्हारे ज्ञान के धूमकेतु से
शेष न रहे, कोई अशुभ संस्कार
कर्म कोई, न बने बंधन
ज्ञान की तलवार से काट डालें
कर्मों के जाल,
जन्मों से जो सता रहे हैं
जल जाएँ दंश उन कर्मों के !

मिट जाये मन की चाह
थम जाये विचारों का प्रवाह
ठहर जाये मन तुम्हारे रूप पर
तुम्हारे सौंदर्य, तुम्हारी सत्यता पर
उस शाश्वतता पर,
जो कभी प्रेम, कभी आनंद बन सम्मुख आती है
कभी करुणा तो कभी
विशुद्ध साहचर्य का भाव बनकर,
निर्दोष प्रकृति के अल्हड़ रूप बनकर
तो कभी भयावह प्रकृति के भीषण प्रकोप बनकर !

हमने सिरों को बचाकर देख लिया
हम असत्य के पुजारी बने रहे
हमने अपने को बहुत आजमाया
अब और नही,
बस यह अंतिम प्रयास हो !


अनिता निहालानी
१७ फरवरी २०११

6 टिप्‍पणियां:

  1. अनीता जी,

    सुन्दर अति सुन्दर......प्रयास तो यही है......बाकि सारे प्रयास तो व्यर्थ हैं...नहीं हैं तो हो जाने वाले हैं कभी न कभी ......जब तक यह अंतिम प्रयास न किया जाये........बहुत सुन्दर पोस्ट......शुभकामनायें|

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  2. हमने सिरों को बचाकर देख लिया
    हम असत्य के पुजारी बने रहे
    हमने अपने को बहुत आजमाया
    अब और नही,
    बस यह अंतिम प्रयास हो !

    कविता के भाव बड़े ही प्रभाव पूर्ण ढंग से संप्रेषित हो रहे हैं !

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  3. मिट जाये मन की चाह
    थम जाये विचारों का प्रवाह
    ठहर जाये मन तुम्हारे रूप पर
    ..............................
    ................................
    पवित्र, अध्यात्मिक , समर्पण की रचना

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  4. एकदम से भीतर उतर जाती है आपकी रचना ...मैं भी ऐसा लिखना चाहती हूँ पर लिख नहीं पाती...धन्यवाद

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