मंगलवार, फ़रवरी 15

वही तो है

वही तो है

विस्तृत नभ की शुभ्र नीलिमा
पर्वत, जंगल की हरीतिमा
महा अंतरिक्ष की अनंतता
कण-कण में छाई जीवन्तता

छुपा सभी में वही तो है !

सिंधु लहरियों के गर्जन में
शांत सरों के जल दर्पण में
फेन, झाग, बूंद में समाया
लहर-लहर में उसकी छाया

बसा सभी में वही तो है !

हो संध्या की श्यामलता, या
मधुर चाँदनी की कोमलता
अर्धरात्रि की नीरवता में
नव किरण की सलज्जता में

रमा सभी में वही तो है !

अनिता निहालानी
१५ फरवरी २०११   

6 टिप्‍पणियां:

  1. वाह !! एक अलग अंदाज़ कि रचना ......बहुत खूब

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  2. रमा सभी में वही तो है !
    बहुत सुन्दर !

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  3. शब्दों के सुंदर चयन से सजी कविता बहुत अच्छी लगी।

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  4. अनीता जी,

    वाह.....वाह.....सच है इस सम्प्पोर्ण अस्तित्व में सिर्फ वही है.....

    तू ही तू रहे,बाकि न मैं न मेरी आरज़ू रहे......

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