मंगलवार, फ़रवरी 1

कर्म से कर्मयोग

कर्म से कर्मयोग

चींटी से हाथी तक
राजा से रंक तक,
मूर्ख से विद्वान तक
सभी रत हैं कर्म में !

श्वास लेते, उठते, बैठते
रोते-हँसते, चलते-फिरते,
उंघते, सोते हुए भी
हम कर्म से विमुक्त नहीं !

कुछ पाने की आस लगाते
इधर-उधर दौड़-भाग करते,  
सुख, धन, सम्मान हेतु
जीवन भर खटते हैं !

चाह अंतर में धरे
पूरा होता है जीवन,
तब भी पीछा नहीं छोड़ते
कर्म पुनः संसार में जोतते !

जो बीज बोये थे
उन्हें काटना है,
नए कर्मों की पौध
को छांटना है !

क्लांत मन, थका तन
एक दिन सजग होता है,
ज्ञानदीपक भक से
भीतर जल उठता है !

कर्म तब बांधते नहीं
निष्काम, निस्वार्थ कर्म,
केवल कर्म के लिये कर्म
कर्म तब कर्मयोग कहलाता है !

अनिता निहालानी
१ फरवरी २०११   

4 टिप्‍पणियां:

  1. कर्मयोग की बहुत सुन्दर व्याख्या करती है आपकी सरल-सहज रचना |
    बहुत हितकर पोस्ट

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  2. क्लांत मन, थका तन एक दिन सजग होता है, ज्ञानदीपक भक से भीतर जल उठता है !
    कर्म तब बांधते नहीं निष्काम, निस्वार्थ कर्म,केवल कर्म के लिये कर्म कर्म तब कर्मयोग कहलाता है !


    सत्य वचन कहती हुई सार्थक रचना

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  3. अनीता जी,

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति......जीवन सार से भरी आपकी ये पोस्ट शानदार है ....ये पंक्तियाँ सबसे अच्छी लगी-

    कुछ पाने की आस लगाते
    इधर-उधर दौड़-भाग करते,
    सुख, धन, सम्मान हेतु
    जीवन भर खटते हैं !

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  4. इस कविता ने समझा दिया कि एक से कर्म करते हुए भी कर्मयोगी के कर्म और हमारे कर्म में कितना फर्क है.

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