गुरुवार, मार्च 10

पल-पल मधु का सोता भीतर

पल-पल मधु का सोता भीतर

चमचम चमक रहा है दिनकर
वर्तमान का मन अम्बर पर,
ढक लेते अतीत के बादल
भावी का कभी छाता अंधड़ !

झर-झर झरता ही रहता है
 पल-पल मधु का सोता भीतर ,
कभी मूर्च्छा पाहन बनती
मोह कभी बन जाता पत्थर !

सुख की तो इक खान छिपी है
दुःख की इस चट्टान के पीछे,
द्वार बंद कर कर्णों के हम
बस बैठे हैं ऑंखें मींचे !

मन सरवर पर फैली काई
उग नहीं पाते शांति कमल,
गतिमय कर्मशील अंतर में
बहता जाता है जल निर्मल !

खिले हुए हैं पुष्प हजारों
उर उपवन पर छाया पाला,
शिशु सम था जो अंतर पावन
चाह जगी मैला कर डाला !

मुक्त हाथ से बांटे प्रकृति
जीवन में जो भी है सुंदर,
पर जाने क्यों हम जो चुनते
बन जाता है वही असुंदर !

अनिता निहालानी
१० मार्च २०११     

7 टिप्‍पणियां:

  1. अनीता जी बहुत सुन्दर.....ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं.....

    सुख की तो इक खान छिपी है
    दुःख की इस चट्टान के पीछे,
    द्वार बंद कर कर्णों के हम
    बस बैठे हैं ऑंखें मींचे !

    मुक्त हाथ से बांटे प्रकृति
    जीवन में जो भी है सुंदर,
    पर जाने क्यों हम जो चुनते
    बन जाता है वही असुंदर !

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  2. bahut sundar likha hai... aapki rachnaa kal charchamanch par hogi... kal manch par jaroor aayen...saadr

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  3. खिले हुए हैं पुष्प हजारों
    उर उपवन पर छाया पाला,
    शिशु सम था जो अंतर पावन
    चाह जगी मैला कर डाला !

    बहुत अच्छी ... मन को शांति देती रचना ...

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  4. अनीता जी पहले तो ब्लाग पर आने का शुक्रिया ।आपकी कविता गहरे भावों को समेटे हैं । पढना अच्छा लगा

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  5. झर-झर झरता ही रहता है पल-पल मधु का सोता भीतर ,कभी मूर्च्छा पाहन बनतीमोह कभी बन जाता पत्थर -bahut sundar Anita ji .aapkee lekhni ka jawab nahi .

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  6. पर जाने क्यों हम जो चुनते
    बन जाता है वही असुंदर !

    ओह...

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