सोमवार, मार्च 21

महाप्रलय

महाप्रलय

कैसी होती है महाप्रलय
झांका जब मैंने ग्रंथों में,
जहाँ पुकार-पुकार कह रहे
कवि-ऋषि अति स्पष्ट शब्दों में !

सृष्टि बनती और बिगड़ती
जाने कितनी बार उजड़ती,
पुनः-पुनः सजती और संवरती
नई-नई तकदीरें गढ़ती !

जब पूरी होती युग आयु
अनाचार प्रबल हो जाता,
जब सत्य, धर्म को तज मानव
निज सुख-साधन में खो जाता !

तब बादल जल ना धारेंगे
त्राहि-त्राहि मच जायेगी,
सूर्य प्रचंड तपन देगा
सागर, नदियाँ कुम्हलायेंगी !

संवर्तक दावाग्नि से
जल जंगल तृण से राख बनें,
अग्नि भूगर्भ की भी जागे
फट ज्वालामुखी लावा उगलें !

वायु धू-धू कर जला करे  
फिर छा जाये घनघोर घटा
गर्जन-तर्जन करते मेघा
वर्षा की बहे अविरल छटा !

बारह बरसों तक पानी की
धाराओं से धरती भीगे
 डूब-डूब जाएंगे प्राणी  
विश्राम करें ब्रह्मा जल में !

एकार्णव में रहें डोलते
बरगद पत्ते पर गोविन्द
दर्शन देते मार्कंडेय को
प्रलय काल का होगा अंत !

अनिता निहालानी
२१ मार्च २०११



11 टिप्‍पणियां:

  1. बड़ा हाहाकारी दृश्य दिखाया है आपने प्रलय का इस पोस्ट के माध्यम से.......प्रशंसनीय |

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  2. जब पूरी होती युग आयु
    अनाचार प्रबल हो जाता,
    जब सत्य, धर्म को तज
    मानव निज सुख-साधन में खो जाता !

    यही समय चल रहा है ...अतिक्रमण होने पर प्रलय आना तो निश्चित ही है ...शब्दों के माध्यम से महाप्रलय का चित्र अंकित कर दिया ...

    अच्छी प्रस्तुति

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  3. दिन और रात की तरह सृष्टि और प्रलय तो इस जीवन की रीत है.रात बीत जाती है ,इसीतरह प्रलयकाल भी बीत जायगा.

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  4. आदरणीय अनिता निहालानी जी
    नमस्कार !

    ...प्रशंसनीय प्रस्तुति

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  5. रचना अच्छी लगी।
    होली की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  6. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 22 -03 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  7. महाप्रलय का सुन्दर चित्रण किया है।

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  8. श्रिष्टि...लय...श्रिष्टि के क्रम का बहुत सुन्दर वर्णन --- इसी संदर्भ में "लखनऊ ब्लोग.असो."पर मेरी रचना ’श्रिष्टि’ महाकाव्य भी देखें....

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