मंगलवार, मार्च 29

अमृत का एक द्वार छिपा


 
रात और दिन दो मित्रों से
मिलते रहते हैं अविराम,
जीवन के कोरे कागज पर
रंग बिखेरें सुबहोशाम !

पलक झपकते में मिल जाता
अमृत का एक द्वार छिपा,
लेकिन वह पल ठहर न पाता
यह सूरज कितनी बार उगा !

जब आयेगी, तब देखेंगे
बार-बार विस्मित हो भूले,
मृत्यु तो जीवन का द्वार
कह कर सुख झूले में झूले !

बढ़ती ही जा रही ऊर्जा
जब से सच का साथ रहा है,
कंकड़-पत्थर दूर हुए सब
हीरे सा मन याद रहा है !

गूंगी पीड़ा हूक उठी जो
मांग रही है कीमत अपनी,
रातों को जो जाग रही थी
नींद पूछती किस्मत अपनी !

क्या केवल दुःख के पल बोये
सुख की बेल सूखती जाती,
जैसे जैसे दिन बीते हैं
दुनिया और अकड़ती जाती !

२९ मार्च २०११


2 टिप्‍पणियां:

  1. sukh ki bela sookhati jati-
    sach me din ba din duniya ka rukh badal raha hai .
    kadavi sachchai kahati rachna -

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  2. अनीता जी,

    अति सुन्दर......जीवन का यतार्थ समेटे ये पोस्ट.....प्रशंसनीय|

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