शनिवार, जून 25

हम और वह


हम और वह

हम अहसान जताते उस पर, जिसको अल्प दान दे देते
किन्तु परम का खुला खजाना, बिन पूछे ही सब ले लेते !

दो दाने देकर भी हम तो, कैसे निर्मम ! याद दिलाते
जन्मों से जो खिला रहा है, क्यों कर फिर उसके हो पाते ?

कैसे मोहित हुए डोलते, मैं बस मैं की भाषा बोलें
परम कृपालु उस ईश्वर का, कैसे फिर दरवाजा खोलें !

कटु वाणी के तीर चलाते, नहीं जानते बीज बो रहे
क्रोध की इस विष की खानि से, निज पथ में शांति खो रहे !

वह करुणा का सागर है, नित अकारण ही रहे दयालु
सदा सहारा देता सबको, शांति का सागर, प्रेम कृपालु !

अनिता निहालानी
२६ जून २०११

12 टिप्‍पणियां:

  1. सदा सहारा देता सबको,

    सदा सहारा देता सबको |
    भूल न जाओ भैया रब को ||

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  2. क्रोध की इस विष की खानि से, निज पथ में शांति खो रहे
    bilkul sahi kah rahi hain anita ji aap.

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  3. वाह! अनीता जी बहुत सुन्दर प्रस्तुति है आपकी.
    आपको तहे दिल से आभार.

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  4. बहुत सुन्दर भाव ... सार्थक सन्देश देती अच्छी रचना

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  5. दो दाने देकर भी हम तो, कैसे निर्मम ! याद दिलाते
    जन्मों से जो खिला रहा है, क्यों कर फिर उसके हो पाते ?

    बहुत सुन्दर भावों से परिपूर्ण कविता...शायद पहली बार आपके ब्लॉग पर आया बहुत अच्छा लगा...मेरे भी ब्लॉग पर घूम जाइए

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  6. वह करुणा का सागर है, नित अकारण ही रहे दयालु
    सदा सहारा देता सबको, शांति का सागर, प्रेम कृपालु !
    bahut sunder abhibyakti.badhaai.



    please visit my blog.thanks.

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  7. कटु वाणी के तीर चलाते, नहीं जानते बीज बो रहे
    क्रोध की इस विष की खानि से, निज पथ में शांति खो रहे !

    वह करुणा का सागर है, नित अकारण ही रहे दयालु
    सदा सहारा देता सबको, शांति का सागर, प्रेम कृपालु !


    बहुत ही सुन्दर और प्रभावशाली. उच्च कोटि की गहरी अनुभूति. आभार इस आध्यात्मिक रचना के लिए.

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  8. दो दाने देकर भी हम तो, कैसे निर्मम ! याद दिलाते
    जन्मों से जो खिला रहा है, क्यों कर फिर उसके हो पाते ?

    बहुत सुन्दर.....

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