सोमवार, जून 27

फूल


फूल

फूल, बस खिलना जानता है !

उसे शुभ घड़ी, शुभ दिन की चाह नहीं
सम्पूर्ण हो जाने के बाद वह
 खुदबखुद आँखें खोल देता है...

पांखुरी-पांखुरी खिलता हुआ, अर्पित करता है सुगंध
निस्सीम गगन, उन्मुक्त पवन और धरा के नाम
वह कुछ भी बचाकर नहीं रखता
मुस्कान, रंग और गंध देकर
चुपचाप झर जाता है !

मोहलत नहीं मांगता
क्योंकि वह दाता है, भिक्षुक नहीं
फूल में सौंदर्य है, दर्प नहीं
फूल में औदार्य है, लोभ नहीं

फूल सहज है, जीवन और मृत्यु दोनों में सहज
वह सूरज का ताप और शीत की मार दोनों सहता है
उलाहना नहीं देता
सिफारिश नहीं करता कि उसे राज वाटिका चाहिए
जंगल का एकांत नहीं
उसे निहारो या उपेक्षा करो, वह गांठ नहीं बांधता
देवालय या मरघट दोनों पर चढ़ता है
फूल बस खिलना जानता है !


अनिता निहालानी
२७ जून २०११ 

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खुबसूरत अनीता जी.....फूल के माध्यम से जो आपने सन्देश दिया है वो बहुत ही प्रेरक है.......हैट्स ऑफ इस पोस्ट के लिए

    'खुदबखुद' को मेरे हिसाब से ऐसे लिखना चाहिए 'खुद-ब-खुद'

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  2. सिफारिश नहीं करता कि उसे राज वाटिका चाहिए
    जंगल का एकांत नहीं
    उसे निहारो या उपेक्षा करो, वह गांठ नहीं बांधता
    देवालय या मरघट दोनों पर चढ़ता है
    फूल बस खिलना जानता है !

    सार्थक सन्देश देती अच्छी प्रस्तुति

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  3. फूलों से मिलता है हमको,
    रंग-सुगंध औ स्वाद |

    मरघट, देवालय, मयखाना,
    लाता समाजवाद ||

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  4. उसे निहारो या उपेक्षा करो, वह गांठ नहीं बांधता
    देवालय या मरघट दोनों पर चढ़ता है

    sahi kaha anita ji,
    makhan lal chaturvedi ji ki ye panktiyan yad aa gayee.
    ''chah nahi surbala ke gahno me goontha jaoon,
    chah nahi premi mala me mvindh nit pyari ko lalchaoon.....

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  5. बिलकुल सही कहा आपने फूल के बारे में.

    सादर

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  6. पर अगर कोई मनुष्य फूल की तरह होता है तो उसे यह संसार फूल नही foolकहता है.

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  7. आप सभी का आभार! अगर कोई सचमुच फूल की तरह हो पाए तो संसार उसके बारे में क्या कहता है उसके पास इसकी फ़िक्र करने का समय ही नहीं होगा....

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  8. क्या बात है, बहुत सुंदर।

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