बुधवार, अक्तूबर 5

सूरज ऐसा पथिक अनूठा


सूरज ऐसा पथिक अनूठा

रोज अँधेरे से लड़ता है
रोज गगन में वह बढ़ता है,
सूरज ऐसा पथिक अनूठा
नित नूतन गाथा गढ़ता है !

नित्य नए संकट जो आते
घनघोर घटाटोप बन छाते,  
चीर कालिमा को अम्बर में
घोड़े सूरज के हैं जाते !

न कबीर हम न ही गाँधी
हमें कंपा जाती है आंधी,
नहीं जला सकते घर अपना
नहीं भुला सकते निज सपना !

जीवन के सब रंग हैं प्यारे
भ्रम तोडना नहीं हमारे,
रब से हम सुख ही चाहते
बना रहे सब यही मांगते !

न द्वेष रहे न रोष जगे
भीतर इक ऐसा होश जगे,
सूरज सा जलना सीख लिया
जिसने, वह हर पल ही उमगे !

7 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया प्रस्तुति ||

    बहुत बहुत बधाई ||

    शुभ विजया ||

    neemnimbouri.blogspot.com

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  2. न द्वेष रहे न रोष जगे
    भीतर इक ऐसा होश जगे,
    bahut sunder....
    vijayadashmi ki shubhkamnayen...

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  3. खुबसूरत भाव भरी कविता
    विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं

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  4. पूरी की पूरी कविता ही शानदार है कोई पंक्ति किसी से कम नहीं|

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