शनिवार, अक्तूबर 1

दिल जाये कुर्बान....


दिल जाये कुर्बान....


श्रद्धा का एक बिरवा रोपा है उसने
मन की धरा पर
सच की खेती करने का बीड़ा उठाया है
जन्मों तक झूठ को आजमाने के बाद...

भ्रम, जो खा रहे थे दीमक की तरह
बुद्धि की इमारत को,
जला डाले हैं और
उखाड़ फेंकी हैं वे दीवारें तेरी-मेरी की  
जो खड़ी कर लीं थी यूँ  ही
किसी कमजोर क्षण में...

उस बिरवे में फल लगेगा
प्रेम का जिस दिन,
उस दिन की स्मृति में
एक वादा किया है खुद से
दिल देके किसी को लौटाना है नहीं
कभी किश्तों में प्रेम चुकाना है नहीं...

देने का किया है निश्चय तो
दे ही डालना है पूरा का पूरा खुद को
प्यार जगे जो भीतर सो न जाये कहीं
पिछली बारों की तरह
 जब मंजिल करीब आकर दूर चली जाती थी...

अब बड़े जतन से सींचना है
इस बिरवे को
ताकि दिल जाये कुर्बान
यही तो है दिल की शान !

8 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया प्रस्तुति ||

    बहुत-बहुत बधाई ||

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  2. वाह …………बहुत सुन्दर भावो की गागर उँडेली है।

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  3. अब बड़े जतन से सींचना है
    इस बिरवे को
    ताकि दिल जाये कुर्बान
    यही तो है दिल की शान !

    फिर एक गज़ब की प्रस्तुति. आभार.

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  4. जहां होगी श्रद्धा , सच , विश्वास और सब कुछ दे देने का भाव वहीं प्रेम उपजेगा । बहुत सुंदर रचना ।

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  5. बहुत सुन्दर भावो की प्रस्तुति.....आभार.बहुत-बहुत बधाई ||

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  6. उस बिरवे में फल लगेगा
    प्रेम का जिस दिन,
    उस दिन की स्मृति में
    एक वादा किया है खुद से
    दिल देके किसी को लौटाना है नहीं
    कभी किश्तों में प्रेम चुकाना है नहीं...

    बहुत खूबसूरत अहसास समेटे पोस्ट.........लाजवाब |

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