गुरुवार, जून 7

मौन का उत्सव


मौन का उत्सव

ठठा कर हँसा वह
नजरें जो टिकीं थीं सामने
लौटा लीं खुद की ओर
और तभी गूंज उठा था सारा जंगल
उस मुखर अट्टाहस से....
ठिठक गए पल भर को
आकाश में गरजते मेघ
सुनने उस हास को
थम गया सागर की लहरों का तांडव
थमी थी जब वह हँसी
और भीतर मौन पसरा था
वहाँ कोई भी नहीं था
जैसे चला गया था कोई परम विश्राम को
अनंत समय बीता कि क्षणांश
कौन कहे
जब एक स्पंदन हुआ फिर
द्वार दरवाजे खुलने लगे
झरने लगे जिसमें से
सुगीत और आँच नेह की
जिसमें डूबने लगा था
सारा अस्तित्त्व
आज उसने स्वयं को उद्घाटित होने दिया था
अब महोत्सव की बारी थी..


17 टिप्‍पणियां:

  1. शनिवार 09/06/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. आपके सुझावों का स्वागत है . धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  2. आज उसने स्वयं को उद्घाटित होने दिया था
    अब महोत्सव की बारी थी..
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति... आभार

    उत्तर देंहटाएं
  3. आज उसने स्वयं को उद्घाटित होने दिया था
    अब महोत्सव की बारी थी..
    वाह!

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह: बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति... आभार अनीता जी

    उत्तर देंहटाएं
  5. मन की गहनता को परिभाषित करती सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत बहुत सुन्दर अनीता जी........

    उत्तर देंहटाएं
  7. इस महोत्सव को पूरे आनंद से जीना चाहिए।

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह! मौन का महोत्सव.....परम विश्राम....

    उत्तर देंहटाएं
  9. वो महोत्सव प्रत्येक में घटित हो यही कामना है।

    उत्तर देंहटाएं
  10. जब भाव चुपचाप उजागर हो जाए तो उत्सव सा ही लगता हैं .......सादर

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहूत सुंदर गहन अभिव्यक्ती..

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं