बुधवार, जून 13

तब भी तू अपना था


तब भी तू अपना था


तब भी तू अपना था
लगता जब सपना था,
दूर तुझे मान यूँ ही
नाम हमें जपना था !

चाहत कहो इसको
या घन विवशताएँ,
दोनों ही हाल में
दिल को ही फंसना था !

स्मृतियों की अमराई
शीतल स्पर्श सी,
वरन् विरह आग में
जीवन भर तपना था !

तेरी तलाश में
छूट गए मीत कुछ,
मिथ्या अभिमान में
पत्ते सा कंपना था !

पेंदी में छेद है
नजर मन पे पड़ी,
इसको भरते हुए
व्यर्थ ही खपना था ! 

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर और बेहतरीन कविता हमेशा की तरह।

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  2. बहुत ही सुन्दर रचना...अनीता जी..आभार

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  3. तेरी तलाश में
    छूट गए मीत कुछ,
    मिथ्या अभिमान में
    पत्ते सा कंपना था !

    सुन्दर रचना...
    सादर

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