गुरुवार, जून 11

श्रद्धा सुमन

श्रद्धा सुमन 

एक ही शक्ति एक ही भक्ति 
एक ही मुक्ति एक ही युक्ति 
एक सिवा नहीं दूजा कोई 
एकै जाने परम सुख होई

तुझ एक से ही सब उपजा है 
यह जानकर हमें पहले तृप्त होना है भीतर 
फिर द्वैत के जगत में आ 
आँख भर जगत को देखना है 
हर घटना के पीछे तू ही है 
हर व्यक्ति के पीछे तेरी अभिव्यक्ति 
हर वस्तु की गहराई में तेरी ही सत्ता है 
यह जानकर झर जाती हैं 
कामनाएं हृदय वृक्ष से 
सूखे पत्तों की तरह 
और फूटने लगती हैं नव कोंपलें 
श्रद्धा का पुष्प खिलता है 
नेह का पराग झरता है 
अनुराग की सुवास उड़ती है 
जो जरूर पहुँचती होगी तुझ तक !

11 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार
    (12-06-2020) को
    "सँभल सँभल के’ बहुत पाँव धर रहा हूँ मैं" (चर्चा अंक-3730)
    पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है ।

    "मीना भारद्वाज"

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  2. तृप्त होना है भीतर से
    बहुत सुंदर रचना

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