सोमवार, अगस्त 8

कान्हा इक उज्ज्वल प्रकाश सा

कान्हा इक उज्ज्वल प्रकाश सा  


घन श्याम गगन में छाए जब 

घनश्याम हृदय में मुस्काए, 

वन प्रांतर में धेनु झुंड लख

बरबस याद वही आ जाए !


पौ फटते ही मंदिर-मंदिर 

जिसे जगाने गीत गूँजते, 

माखन मिश्री थाल सजा नित  

दीप जला आह्वान करते !


पावन गीता श्लोक नित्य ही 

श्रद्धामय स्वरों से बाँचते, 

कर्मयोग का ज्ञान प्राप्तकर 

पूर्ण भक्ति से पालन करते !


गोधूलि में बाजे बाँसुरी 

कदंब वृक्ष, यमुना कूल पर, 

अश्रुसिक्त नयनों से तकता 

 मन राधा सा व्याकुल होकर !


बालक, युवा, प्रौढ़ हर इक को 

आराध्य रूप कृष्ण  मिला है, 

युगों-युगों से भारत का दिल 

उन विमल चरणों पे झुका है !


कान्हा इक उज्ज्वल प्रकाश सा  

राह दिखाता मानवता को, 

चुरा लिया नवनीत हृदय का  

ओढ़ लिया उर सुंदरता को !


7 टिप्‍पणियां:

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  2. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (9 -8-22} को "कान्हा इक उज्ज्वल प्रकाश सा"( चर्चा अंक 4516) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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    कामिनी सिन्हा

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  3. स्वागत व आभार रंजू जी !

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