बुधवार, नवंबर 2

भीतर अनछुआ सा कोई


भीतर अनछुआ सा कोई

माना कि ‘मैं’ जरूरी है
होना जिसका मजबूरी है,
लेकिन बाधा न बन जाये
रब से इतनी ही दूरी है !

परिधि पर ‘मैं’ घूमा करता
रहे केन्द्र पर वही साक्षी,
टूटे सीपी, घोंघे ऊपर
गहराई में मिलते मोती !

मधुर स्मृतियाँ, चाह मदिर सी
ऊपर-ऊपर मन आंगन में,
भीतर अनछुआ सा कोई
पूर्ण तृप्ति है उस पावन में !

एक ही है जब नहीं है दूजा
कौन करेगा किसकी पूजा,
सत् ही सत् है भीतर-बाहर
सबका इक आधार न दूजा !

बस भीतर विश्वास घना हो
वही बिछाए पलकें बैठा,
जितनी प्रीत हमारे भीतर
मैं भी उसके दिल में पैठा !  

8 टिप्‍पणियां:

  1. माना कि ‘मैं’ जरूरी है
    होना जिसका मजबूरी है,
    लेकिन बाधा न बन जाये
    रब से इतनी ही दूरी है !खुबसूरत पंक्तिया....

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  2. जितनी प्रीत हमारे भीतर
    ‘मैं’ भी उसके दिल में पैठा !

    bahut sateek ...sunder prastuti .....

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  3. माना कि ‘मैं’ जरूरी है
    होना जिसका मजबूरी है,
    लेकिन बाधा न बन जाये
    रब से इतनी ही दूरी है !

    सच बिलकुल सच........प्रेम गली अति संकरी जा में दो न समाई..........वाह |

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  4. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच-687:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  5. सत् ही सत् है भीतर-बाहर
    सबका इक आधार न दूजा !

    वाह! सुन्दर प्रस्तुति...
    सादर बधाई...

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  6. एक ही है जब नहीं है दूजा
    कौन करेगा किसकी पूजा,
    बहुत सही कहा आपने!

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  7. बस भीतर विश्वास घना हो
    वही बिछाए पलकें बैठा,
    जितनी प्रीत हमारे भीतर
    ‘मैं’ भी उसके दिल में पैठा !

    sunder namr shabdon me stay ko samjha diya.
    bahut sunder prastuti.

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