सोमवार, दिसंबर 7

जो घर खाली दिख जाता है


जो घर खाली दिख जाता है 
एक-एक कर चुन डाले हैं 
राह के सारे पत्थर उसने, 
कंटक चुन-चुन फूल उगाये 
हरियाली दी पथ पर उसने ! 

ऊपर-ऊपर यूँ लगता है 
पर भीतर यह राज छिपा है, 
वह खुद ही आने वाला है 
उस हेतु यह जतन किया है ! 

जिस दिल को चुनता घर अपना 
उसे संवारे सदा प्रेम से, 
जो घर खाली दिख जाता है 
डेरा डाले वहीं प्रेम से ! 

उसकी है हर रीत निराली  
बड़ा अनोखा वह प्रियतम है, 
एक नयन में देता आँसू 
दूजे में भरता शबनम है ! 

वह जो है बस वह ही जाने 
हम तो दूर खड़े तकते हैं, 
वही पुलक भरता अंगों में 
होकर भी हम न होते हैं ! 
 

9 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (8-12-20) को "संयुक्त परिवार" (चर्चा अंक- 3909) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    कामिनी सिन्हा

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  2. उसकी है हर रीत निराली
    बड़ा अनोखा वह प्रियतम है,
    एक नयन में देता आँसू
    दूजे में भरता शबनम है ! ...सुंदर मनोहारी कृति...।

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  3. एक-एक कर चुन डाले हैं
    राह के सारे पत्थर उसने,
    कंटक चुन-चुन फूल उगाये
    हरियाली दी पथ पर उसने !

    बहुत सुंदर रचना...🌹🙏🌹

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  4. बहुत सुंदर सृजन।
    सादर।

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