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मंगलवार, जनवरी 31

मन भी किसी और की माया

मन भी किसी और की माया


​​माटी से निर्मित यह भूमा

माटी से ही चोला तन का, 

माटी का भी स्रोत कहीं है 

ढूँढे वही यात्री मन का !


हर पदार्थ मन की छाया है 

मन भी किसी और की माया, 

निजता में ही मिलता शायद 

धुर नीरव  में नाद समाया !


ज्यों कुम्हार मन में रचता है 

फिर आकार बनें माटी के, 

उर संवेग भाव उमड़ें जब  

तब उढ़ाए वस्त्र शब्दों के !


  जग में मुक्त वही विचरे वपु 

मुदिता मद सम नीर उर भरे, 

 अकल्पनीय स्वप्न पलकों में

नहीं विकल्पों से कभी डरे !


शुक्रवार, मई 21

प्रसाद

प्रसाद 


बरस रहा है कोई अनाम जल 

जो भिगोता है भीतर-बाहर सब कुछ 

भीग जाता है हर कोना कतरा अंतर  का 

तरावट से भर जाती है मन की माटी

इसका कोई स्रोत नजर नहीं  आता 

पर भर लेती है अपने आगोश में 

 प्रकाश की एक धारा 

बरसती है अकारण कभी-कभी 

शायद सदा ही 

पर नजर आती है कभी-कभी 

जाने क्यों !

शायद वह किसी का सन्देश लाती है 

अंतर को भरने आती है 

प्रेम और करुणा से 

सूना न रहे एक क्षण के लिए भी मन का घट

बहती रहे पुरवाई सदा मन के आंगन में 

वह जताने आती है अकेले नहीं हैं हम 

हर पल कोई साथ है 

 भर देती है अनोखी सिहरन रग-रग में 

 कर देती पावन शब्दों को भी अपने परस से 

कैलाश के हिमशिखरों सा 

 या गंगा के शीतल निर्मल जल जैसा  

मानसरोवर में तैरते हंसों की तरह 

अथवा उषा की लालिमा में छायी सूर्य की प्रथम रश्मि सी  

वह एक नजर है किसी गुरू की 

जो हर लेती है सारा विषाद शिष्य के अंतर का 

या एक स्पर्श  है माँ के हाथों का 

अथवा तो पिता का सबल आधार है 

जो शिशु को डिगने नहीं देता 

इन सबसे बढ़कर वह सहज प्रेम है 

या उसमें सब कुछ समाया है 

वह किसी सीमा में नहीं बंधता 

उसे मापा नहीं जा सकता  

वह अज्ञेय है 

अपार है, अनंत है 

तो फिर यही कह दें 

वह ‘उसी’ का प्रसाद है ! 



 

बुधवार, अप्रैल 29

जिस दिन लिखने को कुछ शेष न रहे

जिस दिन लिखने को कुछ शेष न रहे 

जिस दिन लिखने को कुछ शेष न रहे 
कहने को कोई शब्द न मिले 
नत मस्तक हो जाना ही होगा 
उस अनाम के आगे 
जो परे है वाणी के 
मौन में वह स्वयं का पता दे रहा है 
हमसे हमारा ‘अहम’ ले रहा है 
जो निःशब्द में सहज ही मिलता है
शब्दों के अरण्य में खो जाता है 
जैसे खो जाती है सूर्य किरण घने वनों में 
जहां वृक्षों की शाखाएँ सटी हैं इस तरह 
कि सदियों से नहीं पहुँची सूर्य की कोई किरण 
नहीं छुआ वहां की माटी को अपने परस से 
जहाँ काई और नमी में डेरा बना लिया है 
कीट-पतंगों ने 
मन में शब्दों का जमघट ‘उसे’ आने नहीं देता 
जो सदा ही उजास बनकर आसपास है 
इस सन्नाटे में उसी से भरना होगा मन का कलश 
और छलक-छलक कर वही रिसेगा 
भर जायेगा कण-कण में तन के 
ऊर्जा की एक लहर बन कर समो लेगा जब 
यह सत्य तभी स्पष्ट होगा कि 
एक लहर के सिवा क्या हैं हम ....? 

सोमवार, सितंबर 10

जलधाराओं का संगीत


जलधाराओं का संगीत 

नभ से गिरती हुई जल धाराएँ
जिनमें छुपा है एक संगीत
जाने किस लोक से आती हैं
धरा को तृप्त कर माटी को कोख से
नव अंकुर जगाती हैं
सुंदर लगती हैं नन्ही-नन्ही बूँदें
धरती पर बहती हुई छोटी छोटी नदियाँ
जो वर्षा रुकते ही हो जाती हैं विलीन
गगन में उठा घनों का गर्जन
और लपलपाती हुई विद्युत रेखा
दिन में ही रात्रि का भास देता हुआ अंधकार
 दीप्त हो जाता है पल भर को
जैसे कोई विचार कौंध जाये मन में
और पुलक सी भर जाये तन में !


सोमवार, जुलाई 30

शब्दों से ले चले मौन में


शब्दों से ले चले मौन में


माटी का तन ज्योति परम है
सद्गुरु रब की याद दिलाता,
है अखंड वह परम निरंजन
तोषण का बादल बरसाता !

खुद को जिसने जान लिया है
गीत एक ही जो गाता है,
एक तत्व में स्थिति हर क्षण 
अंतर प्रेम जहाँ झरता है !

शब्दों से ले चले मौन में
परिधि से सदा केंद्र की ओर,
गति से निर्गति में ले जाए
मिले नहीं कभी जिसका छोर !

परम आत्म का स्मरण दिलाता
सहज मूल की ओर ले चले,
सच से जो पहचान कराए
भेंट करा दे उस प्रियतम से !

इक से जिसने नाता जोड़ा
एक हुआ उसका अंतर मन,
अपने लिए नहीं जीता वह
जग हित उसका पावन जीवन !

मिटे सभी भय मीत बना जग
खाली हुआ हृदय घट उसका,
बांट रहा दोनों हाथों से
घटता नहीं रंच भर जिसका !

शुक्रवार, अगस्त 8

स्वतंत्र हैं हम

स्वतंत्र हैं हम



यही सच है कि
अपने ही हाथों खोदे हैं
अपने मार्ग में हमने गड्ढे
गिर कर उनमें फिर पछताए हैं

हाँ, यही सच है
अपने ही कारण बार-बार
ठगे गये हैं हम जीवन के खेल में

जब हर तरफ ख़ुशी की
 बरसात हो रही थी
ओढ़ लिया था हमने ही मायूसी का छाता
जब परमात्मा सूर्य बनकर
चमचमा रहा था गगन में
हम छुप गये थे
गहन, गीली, संकरी कन्दराओं में
रेंगने को मजबूर  

जब हवाएं आकाश में डोलती फिरती थीं
हमने माटी के नीचे खोद ली थीं खंदके
और डर कर मौत से छुपते फिर रहे थे

हाँ, यह सच है
हम ही चूक गये हैं बार-बार
उस अनंत की यात्रा पर जाने से
हमने ही स्वर्ण पिंजरों में
चाह था कैद होना

जब पुकार लगाई जा रही थी
प्रातः समीरण के साथ मन्दिर
की घंटियों के संग आती
मधुर झंकार के रूप में
हम किसी गहरी नींद में सोये थे
उसी बेहोशी में शायद हमने ही
बीज बोये थे
अब जब नजर आते हैं
बबूल के जंगल अपने चारों ओर
तो याद आती हैं वह तंद्रालस से भरी सुबहें


यह भी सच है
अपने ही हाथों खड़े कर सकते हैं
हम सुवर्ण महल अपने चारों ओर
जहाँ सुनाई देता है दैवीय संगीत
और छाई है एक अपूर्व शांति की सुगंध
जहाँ से उठती हैं ऋचाएं और शंखनाद
जहाँ से बहती है प्रेम की अजस्र धारा
जहाँ मिलता है हर जीवन को
आश्रय आनंद पूर्ण
जहाँ से उगते हैं दिव्य कमल
जहाँ प्रीत है अतीव सुकोमल

सच दोनों हैं
चुनाव हमें करना है
अपने अन्तस् को हमें भरना है
जो चाहे कर लें
जो चाहे भर ले

स्वतंत्र हैं हम...

गुरुवार, जुलाई 10

इंगित हर शै तुझको करती

इंगित हर शै तुझको करती



कैसे हो अभिसार हमारा !

तुम वासी हो नीलगगन के
उस अपंक निरभ्र नीरव के,
माटी के तन में हम रहते
सने पंक में उड़ ना पाते !

कैसे उर स्वीकार हमारा !

 अभिराम ! वैकुंठ निवासी
छलते अविरत निज माया से,
अर्घ्य चढ़ाता भक्त बना जो
डर जाता है निज छाया से !

हो कैसे उद्धार हमारा !

अर्थाकुल उर प्रश्न पूछता
उपालम्भ भी एक लिए है,
कृपा का बादल बरस रहा जब
अवलम्ब क्यों और दिए हैं !

किस पर है अधिकार हमारा !

इंगित हर शै तुझको करती
आर्त हुआ हर उर यह जाने,
किन्तु भुलावे में रख स्वयं को
उन्मन सा हर दुःख को माने !

जीवन है उपहार तुम्हारा !

मंगलवार, जनवरी 17

बीज से फूल तक


बीज से फूल तक


कृषि भवन के विशाल कक्ष में
शीशे के जार में बंद एक नन्हा सा बीज
था व्याकुल बाहर आने को
नयी यात्रा पर जाने को....
खरीदने की मंशा लेकर तभी आया एक किसान
तैयार थी माटी, रोपा गया वह बीज उसी शाम
तृप्त हुआ था बीज
 पाकर सिंचन
और ऊष्मा धरा की
उठने को आतुर था
गगन और पवन के सान्निध्य में
मर मिटने को था वह तैयार
मिलाने पंच भूतों की काया पंच भूतों से
पर नहीं था तैयार उसका खोल
जो आज तक था रक्षक
बना था बाधक
कांप उठा वह
क्या इस बार भी
भीतर ही भीतर सूख जायेगा
नन्हा सा अंकुर
नहीं... पुनः नहीं
जाना ही होगा इस खोल को
ताकि एक दिन फूल बनने की
 सम्भावना को तलाश सके बीज
एक नयी पीढ़ी को सौंप जाये अपनी विरासत
पूरी शक्ति से भेद डाला आवरण
आ ऊपर धरा के ली दीर्घ श्वास
अभी लंबी यात्रा तय करनी है
कितने मौसमों की मार सहनी है
कितनी हवाओं से सरगोशियाँ
तितली, भंवरों से
गुफ्तगू करनी है
वह उत्सुक है जीवन को एक बार फिर जीने के लिए
उत्सुक है हवा, जल और ऊष्मा को पीने के लिये   
 फूल बन कर अस्तित्त्व के चरणों में समर्पित होने के लिए
कैसा होगा वह पल जब
अपना सौंदर्य और सुरभि सौंप
बच जायेगा यह बीज उन हजार बीजों में
अस्तित्त्व भी प्रतीक्षा रत है
बनने साक्षी उस घड़ी का...