सोमवार, जुलाई 28

जहाँ मौसम बदलते नहीं

जहाँ मौसम बदलते नहीं


जहाँ कोई नहीं दूसरा
एक ऐसा भी देश है
जो नहीं धारण किया जाता प्रदर्शन के लिए
एक ऐसा भी वेश है
जहाँ टूट जाती हैं सब बेड़ियाँ
छूट जाती हैं रागात्मक छवियाँ
एक ऐसा भी प्रदेश है
जहाँ ठहर जाता है काल का रथ
ध्वनि का होता नहीं प्रवेश है
जहाँ नहीं कोई विरोध
जन्म लेती नहीं कोई कुंठा
कोई विडम्बना भी नहीं सताती
जहाँ दो न रहने से कोई स्मृति भी नहीं रह जाती
जहाँ खो जाती है अपनी छाया भी
नितांत एकांत ही जिसका होना है
एक ऐसा भी आदेश है
जहाँ मौसम बदलते नहीं पल-पल
जहाँ वसंत पतझड़ के आने की आहट नहीं देता
जहाँ बिन बरसे बादल कभी गुजरा ही नहीं
जहाँ नित एक रस मधुरता छायी है
जिसमें होना विपदा का मानो विदेश है
जहाँ निर्धूम अग्नि जलती है
 ज्योति की अखंड शिला पल-पल पिघलती है
जहाँ कोई मार्ग नजर नहीं आता
पर मंजिल हर कदम पर मिलती है
ऐसा भी एक स्वदेश है
जाना जहाँ संकट के मार्ग से गुजरना है
जहाँ टिकना तलवार की धार पर चलना है
 जो स्वयं को खो कर ही जाना जाता है
एक ऐसा भी महेश है !  


10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (29-07-2014) को "आओ सहेजें धरा को" (चर्चा मंच 1689) पर भी होगी।
    --
    हरियाली तीज और ईदुलफितर की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. स्वागत व आभार प्रतिभा जी !

      हटाएं
  3. उस महेश की ,उस प्रदेश की , उस वेष की और दुर्दम आदेश की कल्पना ही दुर्निवार है - इस दुनिया का कुछ भी नहीं वहाँ -नितान्त अपरिचित और अचल !!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपने बिलकुल सही कहा है प्रतिभा जी !

      हटाएं
  4. कल 13/अगस्त/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं