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मंगलवार, जून 1

ऐसे ही घट-घट में नटवर

ऐसे ही घट-घट में नटवर

अग्नि काष्ठ में, नीर अनिल में 

प्रस्तर में मूरत इक सुंदर, 

सुरभि पुष्प में रंग गगन में 

ऐसे ही घट-घट में नटवर !


नर्तन कहाँ पृथक नर्तक से 

हरीतिमा नंदन कानन से, 

बसी चाँदनी राकापति में 

ईश्वरत्व भी छुपा जगत में !


दीप की लौ में जो बसा है 

वह प्रकाश चहुँ ओर बिखरता, 

प्रेम, शांति, आनंद की ज्योति 

उस से पाकर जगत सँवरता !


अनुभूति उसी मनभावन की 

अंतर में विश्वास जगाती, 

है कोई अपनों से अपना 

शुभ स्मृति पल-पल राह दिखाती !


जगत की सत्ता जगतपति से 

जिस दिन भीतर राज खुलेगा, 

एक स्वप्न सा है प्रपंच यह 

बरबस ही उर यही कहेगा !

 

बुधवार, मई 27

लहरों से थपकी देता है

लहरों से थपकी देता है 


कोई सुख का सागर बनकर 
लहरों से थपकी देता है, 
हौले-हौले से नौका को 
मंजिल की झलकी देता है !

बरसे जाता दिवस रात्रि वह 
मेघा लेकिन नजर न आये, 
टप टप टिप टिप के मद्धिम स्वर 
मानो दूर कहीं गुंजाये !

कोई ओढ़ा देता कोमल 
प्रज्ज्वलित आभा का आवरण, 
सुमिरन अपना आप दिलाता 
पलकों में भर दे सुजागरण !

सूक्ष्म पवन से और गगन से 
नहीं पकड़ में समाता भाव, 
होकर भी ज्यों नहीं हुआ है 
हरे लेता है सभी अभाव !

जाने कैसी कला जानता
भावों से मन माटी भीगे, 
धड़कन उर की राग सुनाये 
भरे श्वास में सुरभि कहीं से !

गुरुवार, जुलाई 21

अमराई से कोकिल स्वर जब



अमराई से कोकिल स्वर जब


झर-झर झरते हरसिंगार जब
भीतर भी कुछ झर जाता,
कुम्हलाया बासी था जो मन
पल भर में ही खिल जाता !

बही समीरण सुरभि भरे जब  
अंतर में कुछ भर जाता,
तंद्रा में अलसाया सा मन
गीत जागरण के गाता !

सोंधी सी जो महक धरा से
पावस ऋतु का दे संदेसा,
सूना सा मन का उपवन झट
शत कमलों से मदमाता !

अमराई से कोकिल स्वर जब
आतुर श्रवणों से टकराता,
गीत जन्म लेते अंतर में
विरह पगा मन अकुलाता !  

शनिवार, जून 2

एक असीम गीत भीतर है


एक असीम गीत भीतर है


निर्मल जैसे शुभ्र हिमालय
स्वयं अनंत है व्यक्त न होता
यही उहापोह मन को डसता !

एक असीम गीत भीतर है
गूंज रहा जो प्रकट न होता
यही उहापोह मन को खलता !

खिल न पाता हृदय कुसुम तो
कलिका बनकर भीतर घुटता
 यही उहापोह मन में बसता !

सुरभि निखालिस कैद है जिसकी
ज्योति अलौकिक कोई ढकता 
यही उहापोह लिये तरसता !

सबके उर की यही कहानी
कह न पाए कितना कहता
 देख उहापोह मन है हँसता !

बुधवार, जनवरी 4

सुरभि अनोखी

सुरभि अनोखी

गूंजती हैं जब वेद ऋचाएँ कहीं
या हवा के कंधों पर उड़कर
आती हैं अजान की आवाजें..
ले आती हैं सुगन्धि उसकी...

आत्मा के नासापुट ढूँढते रहे हैं
जिस सुरभि को जन्मों–जन्मों से
माटी की देह का नहीं कुछ मोल जिसके बिना
माटी में मिल हो जाये माटी
इससे पूर्व सुरभि भरे भीतर
जो व्याप्त है कण-कण में
पर मन का धुँआ इतना घना है
कि वह गंध खो जाती है
नहीं पहुंचती आत्मा तक...