ऐसे ही घट-घट में नटवर
अग्नि काष्ठ में, नीर अनिल में
प्रस्तर में मूरत इक सुंदर,
सुरभि पुष्प में रंग गगन में
ऐसे ही घट-घट में नटवर !
नर्तन कहाँ पृथक नर्तक से
हरीतिमा नंदन कानन से,
बसी चाँदनी राकापति में
ईश्वरत्व भी छुपा जगत में !
दीप की लौ में जो बसा है
वह प्रकाश चहुँ ओर बिखरता,
प्रेम, शांति, आनंद की ज्योति
उस से पाकर जगत सँवरता !
अनुभूति उसी मनभावन की
अंतर में विश्वास जगाती,
है कोई अपनों से अपना
शुभ स्मृति पल-पल राह दिखाती !
जगत की सत्ता जगतपति से
जिस दिन भीतर राज खुलेगा,
एक स्वप्न सा है प्रपंच यह
बरबस ही उर यही कहेगा !



