सोमवार, जनवरी 2

ऐसे ही वह हमें सहेजे



ऐसे ही वह हमें सहेजे

पीछे-पीछे आता है वह
परम सनेहे हर पल भेजे,
मोती जैसे जड़ा स्वर्ण में
ऐसे ही वह हमें सहेजे !

घेरे हुए है चहूँ ओर से
माँ के हाथों के घेरे सा,
गुंजन मधुर सुनाता हर पल
मंडराए ज्यों मुग्ध भ्रमर सा !

गहन शांति व मौन अनूठा
भर जाता भीतर जब आये,
जन्मों की साध हो पूरी
ऐसा कुछ संदेश दे जाये !

ज्योति का आवरण ओढ़ाता
एक तपिश अनोखी प्रीत,
सब कुछ जैसे बदल गया हो
बदला हो प्रांगण व भीत !

भान समय का भी खो जाता
नहीं कोई वह रहे अकेला,
अपनी मस्ती में बस खोया
एक हुए नीरव या मेला !   

9 टिप्‍पणियां:

  1. एक हुए नीरव या मेला .अच्च्छी प्रस्तुति .बधाई .

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  2. राजेश जी, वन्दना जी, रजनीश जी, इमरान जी, वीरुभाई जी व संगीता जी, आपसभी का आभार व स्वागत !

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  3. क्षमा कीजिये व्यस्तता वश पहले नहीं पढ़ पाई ...आपकी रचनाएँ ह्रदय आह्लादित करतीं हैं ....!!
    बहुत सुंदर रचना ....
    शुभकामनायें....

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  4. अनोखी प्रीत का भान कराती हुई अनोखी रचना के लिए बधाई..

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