गुरुवार, जुलाई 24

करुण पुकार इस धरा की

करुण पुकार इस धरा की


इजराइल में आग उगलती हैं तोपें
फिलिस्तीन जलता है
युक्रेन में शहीद होते हैं निर्दोष नागरिक
रूस भी पिघलता है
युद्ध की ज्वाला खा रही है इराक को
सीरिया का जख्म अभी है हरा
ए खुदा ! मारी गयी है मत तेरे बन्दों की
हिरोशिमा-नागासाकी से जी उनका नहीं भरा
लाचार है यूएनओ लाचार है अमेरिका और चीन भी
भारत इस हिंसा को देखता मौन है
फिर ढूँढ़ता हल इसका कौन है ?
करुण पुकार इस धरा की
नहीं जाती किसी के कानों में  
डूबी जाती है अन्याय व अत्याचार के भार से
जहाँ अमृत बरस सकता हो हर क्षण
वहाँ जहर फैला है अज्ञान का
दिलों और देशों को जो एक नहीं होने देता
भुलाकर भेद धर्म और जाति का
इन्सानियत का पुष्प खिलने नहीं देता
तब क्या अर्थ रह जाता है
धर्म के नाम पर होते इस संघर्ष का
इक्कीसवीं सदी की यह कैसी मानसिकता  
अंधकार मय युग की जहाँ छायी कालिमा  
कबीलों की जगह अब कौमें हैं लड़ती
विकास के नाम पर सभ्यता सिर धुनती  
किस सच की बात कर रहे विद्वान् विश्वविद्यालयों में
संदेश मिल रहे कैसे नई नस्ल को वाचनालयों में
कैसे मन्दिरों और मस्जिदों का वर्चस्व रहेगा  
जब नामलेवा इन्सान का हृदय ही
हिंसा से कठोर होकर न बचेगा ?




3 टिप्‍पणियां:

  1. स्वागत व आभार अमित जी !

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  2. हर युग में अशान्ति और संघर्ष रहा है -बुद्धि और विज्ञान के विकास के साथ उसका दुरुपयोग भी बढ़ता गया.

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