रविवार, जुलाई 27

एक कुमारी कन्या जैसे

एक कुमारी कन्या जैसे


कौन कहे जाता है भीतर
चुकती नहीं ऊर्जा जिसकी,
कौन गढ़े जाता है नूतन
प्यास नहीं बुझती उसकी !

एक कुमारी कन्या जैसे
है अभीप्सा शिव वरने की,
तृप्त नहीं होता है घट यह
बनी लालसा है भरने की !

एक अनंत स्रोत है जिससे
नित नवीन भाव जगते हैं,
पल भर कोई थम जाता जब
अमृत घट बरबस बहते हैं !

शब्द उसी के भाव उसी के
जाने क्या रचना वह चाहे,
कलम हाथ में कोरा कागज
सहज गीत इक रचता जाये 

4 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर प्रस्तुति , आप की ये रचना चर्चामंच के लिए चुनी गई है , सोमवार दिनांक - 28 . 7 . 2014 को आपकी रचना का लिंक चर्चामंच पर होगा , कृपया पधारें धन्यवाद !

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  2. आशीष जी व प्रतिभा जी, स्वागत व आभार !

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