शनिवार, अगस्त 9

भीतर एक नदी बहती है



भीतर एक नदी बहती है

भीतर एक नदी बहती है
लेकर कितने भेद हृदय में,
अंतर को सिंचित करती है !

उद्गम कहाँ ? कौन जानता
अंत भी अनदेखा ही रहता,
निर्मलता उर में भरती है !

तट पर कितने दुर्ग बनाये
युद्ध लड़े हारे जितवाए,
अनथक वह गतिमय रहती है !

सुर सरिता है यूँ भासता
देवलोक से आई भू पर,
मृत अतीत संग ले जाती है !

भावों की हाला भर उर में
मृदु मद्धिम गाती इक सुर में,
मंथर गति से इतराती है !



9 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ... क्‍या बात है
    अनुपम भाव संयोजित किये हैं आपने
    सादर

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    1. ओंकार जी व सदा जी, स्वागत व आभार ,!

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  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, रविवार, दिनांक :- 10/08/2014 को "घरौंदों का पता" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1701 पर.

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  3. भीतर एक नदी बहती है
    लेकर कितने भेद हृदय में,
    अंतर को सिंचित करती है !

    यह नदी सदा निर्मल बानी रहे तो अच्छा
    सुन्दर रचना

    रक्षाबंधन की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएँ !

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  4. बहुत सुन्दर है कविता नया पैरहन प्रतीकों का लिए अभिनव बिम्बों का वितान लिए छंद लयऔर ताल लिए :

    भीतर एक नदी बहती है
    लेकर कितने भेद हृदय में,
    अंतर को सिंचित करती है !

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  5. बढ़िया प्रस्तुति।
    रक्षाबन्धन के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  6. शिवनाथ जी, वीरू भाई व शास्त्री जी, आप सभी का स्वागत व आभार !

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