रविवार, अगस्त 3

एक लहर शिव व सुंदर की


एक लहर शिव व सुंदर की


स्पृहा सदा सताती मन को
बढ़ जाता तब उर का स्पंदन,
सदानीरा सी मन की धारा
कभी न लेने देती रंजन !

संपोषिका प्रीत अंतर की
खो जाती हर पीड़ा जिसमें,
एक लहर शिव व सुंदर की
भर जाती थिरकन उर में !

मिटे स्पृहा प्रीत जगे जब
मुक्त खिलेगा अंतर उपवन,
सत्य साक्षी होगा जिस पल
सहज छंटेगा तिमिर का अंजन ! 

9 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर प्रस्तुति , आप की ये रचना चर्चामंच के लिए चुनी गई है , सोमवार दिनांक - 4 . 8 . 2014 को आपकी रचना का लिंक चर्चामंच पर होगा , कृपया पधारें धन्यवाद !

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  3. आशीष जी, मनोज जी, सुमन जी, प्रतिभा जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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  4. बहुत प्रभावी अभिव्यक्ति...

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  5. वाह बहुत सुन्दर प्रस्तुति !

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